पूरे साल इन परेशानियों से जूझती रही प्रिंट मीडिया

पूरे साल इन परेशानियों से जूझती रही प्रिंट मीडिया

Friday, 08 December, 2017

निशांत सक्‍सेना ।।

देश में प्रिंट जर्नलिज्‍म इन दिनों तमाम तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है। इनमें सबसे कड़ा मुकाबला तो इसे समय और नई टेक्‍नोलॉजी से मिल रहा है। आजकल स्‍मार्टफोन का जमाना है। कोई भी सूचना चंद सेकेंडों में स्‍मार्टफोन व सोशल मीडिया पर आसानी से मिल जाती है जबकि प्रिंट में वही सूचना हासिल करने के लिए पूरे एक दिन यानी 24 घंटे तक इंतजार करना पड़ता है। केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली का भी कहना है कि आज के समय में प्रिंट मीडिया के सामने अपनी नई पहचान को तलाशना ही सबसे बड़ी चुनौती है। यदि हम शहरी इलाकों की बात करें तो न्‍यूज हासिल करने के लिए सोशल मीडिया काफी प्रभावी माध्‍यम बन रही है। हालांकि देश में प्रिंट इंडस्‍ट्री भी लगातार आगे बढ़ रही है लेकिन इसकी रफ्तार काफी धीमी है।    

वहीं इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि डिजिटल मीडिया ने टेलिविजन, रेडियो और प्रिंट की ग्रोथ पर ब्रेक लगा दिया है। खास बात यह है कि डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों के मुकाबले अंग्रेजी प्रकाशन काफी प्रभावित हुए हैं।  

KMPG’ रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्रीय भाषा के अखबारों से उम्‍मीद है कि वे इस सेक्‍टर की ग्रोथ को आगे बढ़ाएंगे, क्‍योंकि एडवटाइजर्स इस माध्‍यम में अब ज्‍यादा दिलचस्‍पी दिखा रहे हैं लेकिन जिस हिसाब से लोग डिजिटल कंटेंट में रुचि दिखा रहे हैं उससे यह इंडस्‍ट्री के लिए लंबे समय तक चलने वाला जोखिम माना जा रहा है।

यदि हम वर्ष 2017 की बात करें तो डिजिटल मीडिया की आंधी के अलावा प्रिंट इंडस्‍ट्री को और भी तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। प्रिंट इंडस्‍ट्री इस साल नोटबंदी, जीएसटी और प्रेस की आजादी पर लगाम जैसी तमाम समस्‍याओं से जूझती रही।   

आइए जानते हैं, इस साल प्रिंट मीडिया को किन चीजों ने सबसे ज्‍यादा प्रभावित किया।

नोटबंदी (Demonetisation)

प्रिंट मीडिया की बात करें तो यह एडवर्टाइजिंग और सर्कुलेशन रेवेन्‍यू पर बहुत ज्‍यादा निर्भर होती है। लेकिन इस दौरान इन दोनों में ही गिरावट देखी गई। आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा के बाद से इस सेक्‍टर में काफी आर्थिक मंदी देखी गई।

इस बारे में मिड-डेअखबार के सीईओ संदीप खोसला का कहना है, नौ दिसंबर 2016 से फरवरी 2017 तक बिजनेस में पूरी तरह से ठहराव आ गया था। हमारा सबसे ज्‍यादा रेवेन्‍यू रिटेल और रियलिटी से आता है और नोटबंदी के बाद से दोनों बुरी तरह प्रभावित रहे।

वहीं, दिल्‍ली प्रेसके पब्लिशर परेश नाथ का कहना है, नोटबंदी के दौरान लोग जरूरत की चीजें खरीदने के लिए कैश बचाना चाहते थे। उस दौरान किसी के लिए भी अखबार अथवा पत्रिकाओं पर पैसे खर्च करना प्राथमिकता में शामिल नहीं था। पहले वे अपने पास जमा नकदी को जरूरत की चीजों पर खर्च करना चाहते थे।

KPMG’ की रिपोर्ट के अनुसार, नोटबंदी के दौरान कई बड़े एडवर्टाइजर्स ने अपने रिलीज ऑर्डर्स (ROs) कैंसल कर दिए थे। ऐसे में कई हिंदी, अंग्रेजी व अन्‍य प्रादेशिक भाषाओं के अखबारों को नवंबर-दिसंबर के दौरान अपने पेजों की संख्‍या कम करनी पड़ी थी। वर्ष 2017 की तीसरी तिमाही के दौरान प्रिंट मीडिया कंपनियों के रेवेन्‍यू में तीन से पांच प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

नोटबंदी के बाद पत्र-पत्रिकाओं का सर्कुलेशन रेवेन्‍यू भी कुछ समय के लिए काफी प्रभावित रहा, क्‍योंकि अधिकतर हॉकर्स और वेंडर्स आमतौर पर नकद में कामकाज करते हैं। इसके अलावा, नकद में लेन-देन होने के कारण क्‍लासिफाइड विज्ञापन भी काफी कम हो गए थे।   

 

जीएसटी (Goods and Services Tax)

नोटबंदी के बाद प्रिंट सेक्‍टर जीएसटी से भी काफी प्रभावित रहा। इस बारे में मलयालम मनोरमाके वाइस प्रेजिडेंट वर्गीस चांडी का कहना है, अभी लोग नोटबंदी से जूझ ही रहे थे कि तभी सरकार ने जीएसटी लागू कर दिया। इस तरह के कदमों से रिटेल व्‍यापार काफी प्रभावित रहा। कई छोटे रिटेलर्स तो मार्केट से साफ ही हो गए।’   ‍

जीएसटी से पहले जहां न्‍यूज प्रिंट पर तीन प्रतिशत का टैक्‍स लगता था, वह बढ़कर पांच प्रतिशत हो गया। इसके अलावा पहले प्रिंट एडवर्टाइजमेंट टैक्‍स से मुक्‍त था, लेकिन अब उस पर भी पांच प्रतिशत का टैक्‍स लगा दिया गया।

इस बारे में आउटलुक ग्रुप’  के सीईओ इंद्रानिल रॉय का कहना है कि नोटबंदी का उनके ग्रुप पर इतना प्रभाव नहीं पड़ाजितना टैक्‍स का पड़ा है। रॉय के अनुसार, ‘मुझे लगता है कि विज्ञापन में जो गिरावट आई हैवह नोटबंदी और जीएसटी दोनों के संयुक्‍त प्रभाव से आई है। ऐडवर्टाइजिंग पर जीएसटी का ज्‍यादा प्रभाव पड़ा है।’ 

प्रादेशिक बनाम अंग्रेजी भाषी पब्लिकेशंस (Regional vs English language publications)

सितंबर 2017 में समाप्‍त होने वाली तिमाही की बात करें तो हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍सऔर मिंटका प्रकाशन करने वाली कंपनी एचटी मीडियाके एडवर्टाइजिंग रेवेन्‍यू में पिछले साल की दूसरी तिमाही की तुलना में 8.14 प्रतिशत की कमी देखने को मिली। पिछले साल इसी अवधि के दौरान विज्ञापन रेवेन्‍यू 430 करोड़ रुपये था, जो घटकर 395 करोड़ रुपये रह गया।   

इस बारे में एचटी मीडियाकी चेयरपर्सन और एडिटोरियल डायरेक्‍टर शोभना भरतिया का कहना है, ‘जीएसटी के कारण इंडस्‍ट्री में काफी अनिश्चितता का माहौल रहा। इस कारण हमारे प्रिंट बिजनेस में एडवर्टाइजिंग रेवेन्‍यू की ग्रोथ लगातार चुनौती बनी हुई है।’ 

दूसरी तरफ, डीबी कॉर्प लिमिटेड’ (DBCL) के मैनेजिंग डायरेक्‍टर सुधीर अग्रवाल का कहना है, ‘दूसरी तिमाही में हमारी स्थिति में उल्‍लेखनीय प्रगति हुई है। इसके अलावा कई अच्‍छी पहल शुरू करने के बाद हम काफी खुश हैं।

गौरतलब है कि डीबीसीएलके तहत दैनिक भास्‍कर’, ‘दिव्‍य भास्‍कर’, ‘दैनिक दिव्‍य मराठीऔर सौराष्‍ट्र समाचारका प्रकाशन होता है, जिनके विज्ञापन रेवेन्‍यू में साल दर साल (year-on-year) छह प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है। पिछली साल की दूसरी तिमाही में 374 करोड़ रुपये के मुकाबले यह इस बार बढ़कर 396.6 करोड़ रुपये हो गई है। वहीं, सर्कुलेशन रेवेन्‍यू की बात करें तो इसमें साल दर साल आठ प्रतिशत की वृद्धि हो रही है और पिछले साल की दूसरी तिमाही में 117.9 करोड़ रुपये के मुकाबले यह बढ़कर 127.3 करोड़ रुपये हो गई है।         

खास बात यह है कि यदि हम विभिन्‍न भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं के रेवेन्‍यू के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि क्षेत्रीय भाषाओं के अखबरों के रेवेन्‍यू में काफी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है जबकि अंग्रेजी भाषी पत्र-पत्रिकाओं को इस रफ्तार को हासिल करने में काफी मुश्किल हो रही है। वर्ष 2016 में अंग्रेजी के अखबारों का विज्ञापन रेवेन्‍यू 3.5 प्रतिशत बढ़ा था जबकि हिन्‍दी और अन्‍य क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों के विज्ञापन रेवेन्‍यू में क्रमश: 7.1 और 8.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

लोकमतके चेयरमैन विजय दर्डा का कहना है, ‘आज के समय में छोटे गांव और कस्‍बों में जागरूकता आ रही है और‍ शिक्षा का स्‍तर भी बढ़ रहा है। ऐसे में क्षेत्रीय प‍त्र-पत्रिकाओं का आगे बढ़ना जारी रहेगा। ऐसे में अंग्रेजी अखबारों को इस बारे में चिंता करने के साथ ही अपनी स्‍ट्रेटजी को बदलने की जरूरत है।’  

पत्र-पत्रिकाओं का सर्कुलेशन (Circulation of print publications)

विकसित देशों के विपरीत इन दिनों हमारे देश में डेली सर्कुलेशन भुगतान में बढ़ोतरी हो रही है। दस साल के दौरान प्रिंट इंडस्‍ट्री की सीएजीआर (CAGR) में 4.87 प्रतिशत की ग्रोथ हो रही है। वर्ष 2016 में इंडस्‍ट्री की ग्रोथ में सात प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हालांकि ग्रोथ की यह दर काफी पॉजीटिव है लेकिन रीडर्स इन दिनों डिजिटल कंटेंट में ज्‍यादा रुचि दिखा रहे हैं, जिसके कारण अंग्रेजी अखबारों पर कुछ ज्‍यादा ही दबाव है। जबकि क्षेत्रीय अखबारों की व्‍युअरशिप के साथ-साथ उनके विज्ञापनों में भी बढ़ोतरी हो रही है। यदि हम क्षेत्रीय अखबारों की ग्रोथ की बात करें तो यह 9.4 प्रतिशत है जबकि हिन्‍दी और अंग्रेजी अखबारों की ग्रोथ क्रमश: 8.3 प्रतिशत और 3.7 प्रतिशत है। जबकि ऑडिट ब्‍यूरो ऑफ सर्कुलेशन’ (ABC) के जनवरी से जून 2017 और जुलाई से दिसंबर 2017 के आंकड़ों के अनुसार, इसके कई सदस्‍य प्रकाशनों के सर्कुलेशन में कमी देखने को मिली है। इन आंकड़ों के अनुसार इस दौरान विभिन्‍न भाषाओं में इसके सदस्‍य अखबारों के सर्कुलेशन की ग्रोथ 0.04 प्रतिशत घटी है।

जनवरी से जून 2017 के बीच हिन्‍दी दैनिक अमर उजालाके सर्कुलेशन में गिरावट दर्ज की गई है जबकि ग्रुप के वाइस प्रेजिडेंट (सेल्‍स प्रमोशन और मार्केट डेवलपमेंट) विरेंद्र पठानिया का कहना है कि वर्ष 2017 में अमर उजाला’  के सर्कुलेशन में 12 प्रतिशत की महत्‍वपूर्ण ग्रोथ देखने को मिली है।

साप्‍ताहिक अखबार और मैगजींस की समान स्थिति (Weekly news publications and magazines are in the same boat)

हालांकि ये कहना मुश्किल है कि सर्कुलेशन के ग्रोथ रेट में आई गिरावट ‍नोटबंदी और जीएसटी की वजह से ही हुई है लेकिन इस बात से पूरी तरह इनकार भी नहीं किया जा सकता है। इस बारे में दिल्‍ली प्रेसके पब्लिशर परेश नाथ का कहना है, ‘पत्र-पत्रिकाएं खरीदना किसी भी व्‍यक्ति की पहली प्राथमिकता में शामिल नहीं है। नोटबंदी के दौरान लोग चाहते थे कि उनके पास जो नकदी मौजूद है, उसे अखबार और मैगजींस पर खर्च करने के बजाय रोजाना के इस्‍तेमाल की अन्‍य जरूरी चीजों को खरीदने में खर्च किया जाए।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय’ (MIB) ने तीस अगस्‍त को अखबारों के सर्कुलेशन को वेरिफाई करने का काम प्रेस इंफॉर्मेशर ब्‍यूरो’ (PIB) को सौंपा था। यह पहला मौका है जब पीआईबी को अखबारों के सर्कुलेशन को वेरिफाई करने का काम सौंपा गया। इससे पहले यह काम रजिस्‍ट्रार ऑफ न्‍यूजपेपर्स ऑफ इंडिया’ (RNI) द्वारा किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंत्रालय ने पीआईबी को यह आदेश वर्ष 2019 में होने वाले आम चुनावों को ध्‍यान में रखते हुए दिया है ताकि ‘विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय’ ( डीएवीपी) को पता चल सके कि किस अखबार का वास्‍तविक सर्कुलेशन कितना है और उसी आधार पर अखबारों को सरकारी विज्ञापन जारी किया जा सके। गौरतलब है कि सूचना-प्रसारण मंत्रालय की नोडल एजेंसी ‘डीएवीपी’ सरकारी विज्ञापनों को जारी करती है।

सेंसरशिप (Censorship)

प्रिंट मीडिया के लिए वर्ष 2017 ऐसी तमाम घटनाओं का गवाह रहा जो इससे पहले आपातकाल के दौरान देखी गई थीं। राजस्थान में मंत्रियोंविधायकोंअफसरों और जजों को बचाने वाले विवादित विधेयक के विरोध में एक नवंबर को हिन्‍दी अखबार राजस्‍थान पत्रिकाने पहले पेज पर संपादकीय लिखा। अखबार की ओर से कहा गया कि राजस्‍थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जब तक इस काले कानून को वापस नहीं ले लेतींतब तक अखबार उनके एवं उनसे संबंधित समाचारों का प्रकाशन नहीं करेगा।

वहीं राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस के मौके पर 16 नवंबर को प्रेस की आजादी पर खतरा बताते हुए राजस्‍थान पत्रिका ने अपना संपादकीय खाली छोड़ा था। इसी तरह अपने एक पत्रकार की हत्‍या के विरोध में त्रिपुरा के एक अखबार ने भी पिछले दिनों अपना संपादकीय खाली छोड़ दिया था। दरअसलत्रिपुरा राज्य राइफल्स की दूसरी बटालियन के एक जवान ने बांग्ला अखबार के पत्रकार सुदीप दत्ता भौमिक की गोली मारकर हत्या कर दी थी। बताया गया कि दोनों के बीच कहासुनी हुई थीजिसके बाद बटालियन के जवान ने सुदीप को गोली मार दी।

वहीं, भाजपा युवा मोर्चा के कथित कार्यकर्ताओं द्वारा जलाए गए अखबार समेत त्रिपुरा से प्रकाशित होने वाले कई समाचार पत्रों ने विरोध में अपने अखबारों के संपादकीय खाली छोड़ दिए थे। गौरतलब है कि स्थानीय समाचारपत्र 'पोकनाफामकी प्रतियों को नित्यापट चुथेक में भाजपा दफ्तर के बाहर कुछ अज्ञात शरारती तत्वों ने आग लगा दी थी।

इसके अलावा सितंबर में हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍सके एडिटर बॉबी घोष के इस्‍तीफे का मामला काफी चर्चा में रहा था। उस समय यह चर्चा जोरों पर भी कि इस कदम से पूर्व एचटी मीडिया की चेरपर्सन शोभना भरतिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। बॉबी घोष के हटते ही ‘हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स’ (Hindustan Times) ने विवादित कैंपेन ‘हेट ट्रैकर’ (Hate Tracker) को अपनी वेबसाइट से हटा दिया था। दरअसल, ‘hate tracker campaign’ अपराध को लेकर एक नेशनल डाटाबेस थाजिसे 28 जुलाई को लॉन्‍च किया गया था।

 

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