जयंती की जुबानी: 30 लेखकों की रचना 'बेला' की कहानी...

Thursday, 04 January, 2018

6 जनवरी से दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित होने वाले पुस्तक मेले में 7 जनवरी को लोकार्पण होने वाली किताब '30 शेड्स ऑफ बेला' को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा हो रही है। आम से लेकर खास तक इस किताब पर अपनी बात कह रहे हैं। प्रख्यात गायक कैलाश खेर ने भी इस किताब के बारे में लिखा है।

बेला की रचना का आइडिया कैसे जयंती को आया और फिर कैसे उन्होंने इसे आगे बढ़ाया, आइए जानते हैं उन्हीं की जुबानी...

हुआ कुछ यूं कि पहली अप्रैल को जब डॉक्टर के क्लीनिक से दाहिने पैर पर प्लास्टर लगवा कर निकली, तो ना जाने क्यों जबरदस्त हंसी आ गई। प्लास्टर ताजा-ताजा लगा था, नीले रंग का, घुटनों से कुछ नीचे तक। मैं व्हील चेयर पर बैठी थी और वार्डबॉय मुझे गाड़ी तक छोड़ने आ रहा था। मुझे हंसता देख, वह चौंका, फिर पूछने लगा, मैडम, कोई चुटकुला याद आ गया क्या?

मैंने जवाब दिया: नहीं भाई, आज के दिन तो मैं खुद चुटकला बन गई हूं। याद नहीं, आज अप्रैल की पहली तारीख है, फूल्स डे।

वह शायद समझ नहीं पाया, मैं उसे कैसे बताती कि पिछले साल इसी दिन इसी पांव पर मैं प्लास्टर चढ़ा कर घर जा रही थी!

कहावत है ना, to make a mistake twice… पहली बार असावधानी या दुर्घटना हो सकती है, दूसरी बार? मूर्खता?

अच्छा, पहली बार जब पांव टूटा, एक्सरे के बाद डॉक्टर ने कहा, टोर्न लिंगामेंट है, प्लास्टर लगेगा, तो मैंने एक चुनौती की तरह लिया। जीवन में पहली बार प्लास्टर लग रहा था। बचपन से अब तक भाई-बहनों को देखा था सफेद प्लास्टर लगाए, दोस्तों को भी। अफसोस भी था कि जिंदगी बीत गई, एक बार भी हड्डी ना टूटी। कहीं इस अनुभव से वंचित तो नहीं रह जाऊंगी?

वो चार हफ्ते मजे-मजे में कट गए। बस कार ड्राइव नहीं कर पा रही थी, पर बाकि सब कुछ तो हो ही रहा था।

एक अनुभव काफी है। हंसी भी आ रही थी और कोफ्त भी कि अब यह छह हफ्ते कैसे गुजरेंगे? ऊपर से डॉक्टर ने एक बैसाखी और थमा दी कि एंकल की हड्डी टूटी है, जरा संभल कर।

घर आई। दवाई और नए चढ़े नीले प्लास्टर के नशे में दोपहर को आंख लग गई। शाम तक नींद के झोखों में रही। उठी तो लगा शरीर से ज्यादा भारी तो मन है। पुरानी आदत है, दोपहर को सो जाऊं तो बुखार आ जाता है। और रात के बारह बज जाते हैं, असली सेंस में। पूरी रात फिर नींद नहीं आई। यह डर लगातार घना होता गया कि ऐसा क्या करूं, जिससे यह छह सप्ताह जादू  की तरह झटके में बीत जाएं। मुंबई फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े एक पुराने वाकिफकार बताते थे कि वहां उन सहित कई महानुभाव इस तरह की एंक्जाइटी का सामना तमाम तरह के ड्रग्स से करते हैं। किसी स्क्रीन टेस्ट का रिजल्ट आने में चार दिन का समय है, ऑडिशन को तीन दिन बाकि है, शूटिंग शुरू होने में एक महीना है, क्या करें, तो अफीम फांक लो। बीच के दिन छूमंतर। आसान। इसके बाद जिंदगी क्या रुख लेगी, किसको पता और क्या फर्क पड़ता है?

नशानशाअगला दिन इतवार का था। मेरी युवा मित्र प्रतिष्ठा सिंह मुझसे मिलने आई। बातों-बातों में उसने जिक्र छेड़ दिया, हम शुरू करें?

महीने-दो महीने पहले कुछ दोस्तों के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म के बारे में बात करते समय यह चर्चा हुई थी कि हमें फेसबुक पर कुछ क्रिएटिव काम करना चाहिए। सारी दुनिया इतने नए काम कर रही है, कुछ नया सोच रही है, तो हम क्यों नहीं?

उस समय यह तय हुआ था कि हम मिल कर एक bilingual सीरियल लिखेंगे। इसके बाद भी कुछ साथियों और दोस्तों से बात हुई, सब उत्साहित लगे। पर बात वहीं खत्म हो गई।

प्रतिष्ठा ने कहा, तो लगा इस समय को सही क्यों ना बनाया जाए। उसी दिन से इसे अमली जामा पहनाना शुरू किया। सूची बनाई, किन-किनको शामिल किया जाए। हिंदी और English में। कहानी कैसी हो? एक किरदार को लेकर उसके बारे में अलग-अलग कहानी लिखें या सीरियलाइज्ड हो? कई सुझाव आए। पता नहीं क्यों शुरू से मन में बनारस बसा हुआ था। घाट पर घूमी हूं, शाम की वो प्रसिद्ध आरती भी देखी है। पर मन में यह आस रही कि रात को बजरी पर घूमना है, बनारस की गलियों में विचरना है, वहां की चाट खानी है। योजना बन भी गई थी। पिछले साल मैं अपनी दीदी रजनी के साथ बनारस जाने वाली थी तीन दिन के लिए। होटल, टैक्सी, गाइड सब बुक्ड थे। एकदम अंतिम वक्त पर यानी सुबह-सुबह इंडिगो ने अपनी फ्लाइट कैंसिल कर दी। उस दिन दिल्ली में घना कोहरा था। हमसे कहा गया कि आज और कल आपको बनारस की कोई फ्लाइट नहीं मिल सकती, आप चाहें तो दो दिन बाद की फ्लाइट ले सकती हैं। खीझ कर कैंसिल ही कर दी हमने बनारस की फ्लाइट और सीधे चले गए अमृतसर, वाघा बार्डर और स्वर्ण मंदिर देखने।

बनारस कहीं जहन में रह गया था आधा-अधूरा। उसे पूरा करना था। बस मन में कहीं बात थी कि कहानी के केंद्र में एक युवती होगी और कहानी बनारस से शुरू होगी।

इस प्लानिंग में हफ्ता निकल गया। देखते ही देखते तेरह लेखक भी जुट गए।

तीस दिन-तीस लेखक का ऐसे आयडिया आया, क्योंकि मुझे प्लास्टर में तीस दिन और निकालने थे।

दफ्तर के साथी प्रतिमा और पूनम ने इस प्रोजेक्ट को जैसे शुरू से अपना लिया। दुबई में रहने वाले रवि भाई से बात की, तो वह भी गजब का उत्साहित हो गया। प्रतिष्ठा तो साथ में थी ही। मेरी गुरू और गाइड मुंबई की वरिष्ठ पत्रकार सुदर्शना द्विवेदी की हरी झंडी भी मिल गई। पहले ही दिन से सबके तार जुड़ गए।

पहला एपिसोड मुझे लिखना था। फेसबुक पर घोषणा कर दी थी। #30shadesofBela, 30 day: 30 writers. मंगलवार को पहला एपिसोड पोस्ट करना था। एक अजीब नशा सा तारी होने लगा। रात को जब घर में एपिसोड लिख रही थी, अहसास हुआ कि कुछ नया सा काम होने जा रहा है।

दफ्तर आई, लंच टाइम में एडिट किया और प्रतिमा और पूनम को पढ़ने को दिया।

कुछ ऐसा सोचा था कि हर एपिसोड में लेखक खुद होगा और साथ में होगी बेला। इससे पहले कि उनकी प्रतिक्रिया आती, मुझे लगा कि बेला को मैंने बांध दिया है। इस कहानी में लेखक ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसे में बेला आगे कैसे बढ़ेगी? कैसे वह एक ही किरदार रह पाएगी। क्षण भर लगा, तय करने में कि मुझे बेला को अलग तरह से पेश करना होगा।

अच्छा, बेला नाम भी बस यूंही दिमाग में आया। बाद में जरूर लगा कि थोड़ा पुराना नाम है, कौशल्या, कुंती टाइप। पर इसकी ध्वनि अच्छी लगी। बेला को गढ़ना भी आसान था। जैसे हम सबको पसंद आती है, कुछ वैसी लड़की। बहुत खूबसूरत नहीं, पर अपने आप में पूरी।

बेला को इस रूप में लाने के लिए मुझे शायद ज्यादा सोचना ना पड़ा। प्लॉट सामने था ही। बनारस पहुंची एक अकेली युवती, साथ में हैं दादी की यादें। दादी का मायका था बनारस। दादी के बचपन को जीना चाहती थी बेला।

बेला को जैसे एक परिवार और आधार मिल गया। पहला एपिसोड डालने के बाद ऐसी शांति मिली, जैसे किसी आइवी लीग के कॉलेज में प्रवेश मिल गया हो।

अगले दिन प्रतिष्ठा दोपहर से पहले अपनी कहानी ले कर तैयार थी। कहानी में गजब का ट्विस्ट था। बेला की हमशक्ल। प्रतिष्ठा की कहानी English में थी।

इस मोड़ के बाद लगा कि बेला को अब अपना मकाम मिल जाएगा। एक रफ्तार सा आ गया। देखते ही देखते बेला का कुनबा बढ़ता चला गया। प्रतिमा, रविशंकर, पूनम। चौथे एपिसोड में रवि शंकर कहानी में गजब का ड्रामा ले आए। बेला का अपहरण। ओह, अब लगा कि वाकई बेला अब किसी एक लेखक की नहीं रहने वाली। 

फेसबुक पर कई मित्र जुड़ते चले गए। इकबाल मलिक को आमंत्रित किया, वो फौरन जुड़ने को तैयार हो गए। सुदर्शना जी ने पहले दिन ही कह दिया था कि बेला को तुमने शुरू किया है, अंजाम तक मैं पहुंचाऊंगी। यानी तीसवां एपिसोड उनके नाम।

मुंबई की मित्र शिल्पा, विधुरिता, रूपा भी शुरू में ही जुड़ गए। शिल्पा ने ही अमरेंद्र और इरा टाक का नाम सुझाया। दिल्ली में अमृता और अभिषेक भी प्रोजेक्ट को लेकर बहुत पॉजिटिव दिखे। पांचवें दिन तक आते-आते जब कानपुर से मेरे धर्मयुग के कलीग हरीश पाठक का फोन आ गया, तो अहसास हुआ कि बेला ने अपना कद बढ़ा लिया है। तय हुआ कि हरीश पाठक सोलहवां एपिसोड लिखेंगे जहां से कहानी आगे दिशा लेगी।  

इस बीच ना टूटे पैर की चिंता रही, ना रातों को नींद ना आने की परेशानी। ओह बेला मय होती जा रही थी मैं और हमारी पूरी टोली।

वॉट्सऐप पर एक ग्रुप बना लिया। रोज सुबह से संवाद शुरू हो जाता। वनिता के दिनों की साथी शुचिता जुड़ीं और गायत्री को भी जोड़ लिया। तीस दिन तीस नए लेखकों का वादा, फेसबुक पर जिस लेखक ने कहानी को सराहा, या लिखने की इच्छा प्रकट की, उन्हें भी जोड़ते चले गए। ध्यानेंद्र, रिंकी, सोनाली, शिल्पी, कमलेश, राजलक्ष्मी, सुमन, सुमिता, प्रिया, सना, तुषार, नलिनी, पीयूषहमारे बेला के तीस लेखक बन गए।

अजीब से दिन थेबेला का नशा बढ़ता जा रहा था। अगले दिन का, अगले एपिसोड का बेसब्री से इंतजार रहता। यह चिंता भी कि अगर एपिसोड समय पर न आया, स्तरीय ना हुआ तो क्या होगा? इसका भी तोड़ निकाला कुछ मित्रों ने यह कहकर कि अगर ऐसी कोई इमरजेंसी आती है, तो हम हैं ना। 

शाम होने से पहले फेसबुक और वॉट्सऐप पर मैसेज आ जाते, कब होगा नया एपिसोड लोड?

हमारी टीम में कई माहिर लेखक थे, तो कई नए लेखक भी। ऐसे भी, जो पहली बार कहानी लिख रहे थे। नए लेखक पूरे मन से जुड़े थे और उत्सुक भी थे कि उन्हें क्या लिखना है। हमारे सबसे युवा लेखक तुषार की उम्र बीस साल की थी। हर लेखक का लिखने का अपना अंदाज, अपनी शैली। यह आपको हर एपिसोड में नजर आएगा। शायद इसी सीरीज की यह खासियत भी है।

बेला के एपिसोड के साथ-साथ फेसबुक और व्हाट्सएप पर और भी कई रोचक जानकारियां शेअर कर रहे थे सब। रवि ने यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या इससे पहले फेसबुक पर इस तरह का काम हुआ है? हरीश पाठक ने पता करके बताया कि प्रिंट में जरूर दो या अधिक लेखकों ने मिल कर उपन्यास या कहानियां रची हैं, पर तीस लोगों ने मिल कर वहां भी कोई काम नहीं किया। यानी बेला की टीम एक तरह से इतिहास रच रही थी।

हां, यह भी सच है कि तीस लेखकों को एक साथ एक मंच पर लाना भी आसान नहीं था। कई बार यह भी सुनने को मिला कि इतने लेखकों को कैसे संभालोगी? पर एक बार कमिट करने के बाद पीछे हटने का सवाल ही कहां पैदा होता था।

बेला के एपिसोड्स जैसे-जैसे बढ़ते गए, चुनौतियां भी बढ़ती गईं। सबसे बड़ी चुनौती, कहानी को समेटने की। यह भी एक बड़ा सवाल था कि बेला की कहानी के पाठक और लेखक हर वर्ग के हैं और यह उनको पसंद आनी चाहिए।

जैसे बीच के एक एपिसोड में जब तुषार की बारी आई बेला की मां और पिता की शादी वाला एपिसोड लिखने की, तो उसने तुरंत हाथ खड़े कर दिए, मैं यह एपिसोड कंसीव नहीं कर पाऊंगा। मैं ऐसा सोच ही नहीं सकता। फिर उसने कहानी को एक नया ही युवा नजरिया दिया।

तीस पॉइंट ऑफ व्यू, तीस नजरियाऔर फेसबुक पर पढ़ने वाले लोगों के कमेंट्स। बीसवें एपिसोड के बाद जब कहानी समेटने का समय आया, तब बेचैनी बढ़ गई।

फेसबुक में जुड़ने वाले कई साथी बेला पढ़ रहे थे। उनमें से कुछ ऐसे भी थे जो लिखना चाहते थे। शुरू में तो सबको जोड़ लिया। बाद में जब तीस लेखक लगभग पूरे हो गए, तो कुछ को मना करना पड़ा। कुछ लेखकों ने तो अपने आप से एपिसोड लिख कर भेज भी दिए। उनसे माफी मांगनी पड़ी।

जिन दिनों मैं बेलामय हो रही थी, मेरी पड़ोसिन और बेला के एक एपिसोड की लेखिका सुमिता मेरे साथ बेला के रंग में पूरी तरह रंग चुकी थी। रोज रात हम कहानी पर चर्चा करते और आगे की संभावनाओं पर जिक्र करते।

मेरे पति प्रसाद कुछ दिनों के लिए बाहर गए थे। लौटे तो मैंने उन्हें खबर दी, बेला को ले कर कई प्रकाशक उत्सुक हैं, नए लेखक जुड़ रहे हैं आदि। उन्होंने मुस्कराते हुए सवाल कियाउसका फोन आया कि नहीं जीतेंद्र की बेटी का, जो सीरियल बनाती है?

एकता कपूर? मुस्कराते-मुस्कराते रुक गई। क्या बेला इतनी वाकई एक डेली सोप की तरह हो गई है? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि अंतिम एपिसोड तक आते-आते कहानी में इतना रायता ना फैल जाए कि समेटना मुश्किल हो जाए। यह एक तरह से रियालिटी चैक का भी समय था। तेरह एपिसोड के बाद से लगा कि अब कहानी में फैले और उलझ गए तंतुओं को समेटना पड़ेगा।

इसके बाद लेखकों से बातचीत शुरू की। किरदारों में सामंजस्यता बिठाई गई। बेला को एक विश्वसनीयता देना भी जरूरी था। धीरे-धीरे पुराने किरदार भी जुड़ने लगे। परिस्थितियों में तर्क शामिल हो गया। बनारस की मिठास, मिजाज का जादू जुड़ता चला गया। बनारस, मुंबई, दिल्ली, आस्ट्रेलिया, हरिद्वार ना जाने कितने मकाम आए। शहनाई भी बजी, नए रिश्ते भी बने, सब कुछ ठीक होता सा लगा।

अब बेसब्री से इंतजार था तीसवें एपिसोड का। 11 मई 2017। सुदर्शना जी ने दो दिन पहले ही अंतिम एपिसोड लिख कर भेज दिया था। कहानी पहले ही वे मुझे बता चुकी थीं। बेला को एक परिणिति तक पहुंचाना आसान भी नहीं था। एकदम चौंकाने वाला अंत।

उनतीसवें एपिसोड में घोषणा कर दी थी कि बेला को तीन पत्र मिले हैं और वह अपनी बेटी के साथ कहीं गायब हो गई है।

अंतिम एपिसोड थोड़ा बड़ा था। पर मंजिल तक पहुंचने की यात्रा थोड़ी लंबी तो होती ही है। उस दिन फेसबुक पर तीसवां एपिसोड लोड करने के बाद अद्भुत शांति मिली। बेला को मकाम मिल गया था। बेला क्या बस एक किरदार थी? बेला क्या एक जरिया भर थी हम तीस लेखकों को एक सूत्र में बांधने का?

पीछे मुड़ कर देखती हूं, तो लगता है, बेला मेरे साथ ही थी हर समय। हम मजाक में कहते थे, हम सब बेला हो गए। पर यह सच था। इस बात की तसल्ली भी थी कि बेला का किरदार एकदम हवा-हवाई नहीं हुआ। बेला के अलावा बाकि पात्र भी पूरी शिद्दत से अपनी जगह खड़े रहे। बेला के साथ बीते ये तीस दिन अद्भुत रहे, हर समय रचनात्मकता से छलछलाते, बेला के कुनबे के साथ एक नया रिश्ता बनाते और एक काल्पनिक चरित्र को पूरी शिद्दत से जीते हुए यह महसूस किया कि हम सबकी मेहनत और कुछ नया रचने का माद्दा आखिरकार कामयाब हुआ। तीसवें दिन बेला को अपनी मंजिल मिल और मेरे पांव का प्लास्टर भी उतर गया।

कैसे गुजरे ये छह हफ्ते, पता ही नहीं चला। अगर सारी मुश्किलें इतनी रचनात्मक हों, तो जिंदगी कितनी आसान हो जाएगी, है ना?

बेला पूरी हो गई। पर हम जो तीस साथी बेला के माध्यम से साथ जुड़े, तो कई दिनों तक व्हाट्सएप और फेसबुक पर उसको याद करते रहे, आज भी करते हैं। हम सब एक-दूसरे की खुशियां बांटते हैं। सबको इंतजार है, बेला को एक मूर्त रूप में देखने का। बेला की यह किताब एक तरह से हमारे प्रयासों को एक नया कद दे रहा है। हमारा अपना, बेला परिवार। अकसर सब कहते रहते हैं कि हमें जल्द ही कुछ नया करना चाहिए। मैं भी मानती हूं, मुझे भी इंतजार है, कुछ होने का

 30 शेड्स ऑफ बेला को पूर्ण आकार देने वाले 30 लेखकों को जानिए यहां...

लेखक परिचय

एपिसोड 1: जयंती रंगनाथन:

तीन उपन्यास- आसपास से गुजरते हुए, औरतें रोती नहीं, खानाबदोश ख्वाहिशें, दो कहानी संग्रह- एक लड़की-दस मुखौटे और गीली छतरी, एक संस्मराणत्मक उपन्यास बॉम्बे मेरी जान, बच्चों के उपन्यास कंप्यूटर बना कैलकुलेटर और सोने की ऐनक, तीन दशक से मीडिया में, मुंबई में धर्मयुग, सोनी टेलिविजन से होते हुए दिल्ली में वनिता पत्रिका का संपादन। इन दिनों हिन्दुस्तान अखबार में वरिष्ठ संपादक, फीचर और बच्चों की पत्रिका नंदन की संपादक।

एपिसोड 2: प्रतिष्ठा सिंह :

हिंदी, अंग्रेज़ी, इटालियन और भोजपुरी भाषाओं में कहानी-कविता लिखती हैं। पिछले साल प्रकाशित 'वोटर माता की जय' खूब चर्चित। दिल्ली यूनिवर्सिटी में इटालियन की लेक्चरर हैं और श्रीलाल शुक्ल से बहुत हद तक प्रेरित भी!

एपिसोड 3: प्रतिमा पांडेय:

पंद्रह सालों से मीडिया में। अमर उजाला से होते हुए अब हिन्दुस्तान में डिप्युटी फीचर संपादक। युवा, महिला और बच्चों पर कई आलेख प्रकाशित। बच्चों की कई कहानियां प्रकाशित।


एपिसोड 4: रवि शंकर:

क्वालिफिकेशन से इंजीनियर, पर शौक से बने रिक्रूटमेंट कंसलटेंट। पर मन अभी भी लेखन में रमता है। दुबई में फिश पीपुल कंसलटेंसी के सीईओ। इंग्लिश और हिंदी साहित्य पढ़ने के अजीबोगरीब शौकीन।

एपिसोड 5: पूनम जैन:

जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों ही दिल्ली। कॉमर्स से ग्रेजुएशन करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से ही पत्रकारिता की पढ़ाई। प्रभात खबर और अमर उजाला से होते हुए फिलहाल हिन्दुस्तान अखबार के साथ। उन रास्तों की तलाश में रहती हूं, जो अच्छा पढ़ने, घूमने, खाने और सुकून से सोने की ओर ले जाएं।


एपिसोड 6: इकबाल रिजवी:

बरेली कॉलेज से इतिहास और पेंटिंग में एम ए के बाद 1989 में दैनिक जागरण से जुड़ कर पत्रकार बन गए। अमर उजाला से होते हुए दिल्ली में इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े। 27 वर्षों के अपने पत्रकारिता के जीवन में करीब 100 डाक्यूमेंट्री बनाने के साथ साथ धर्म, कला, साहित्य और संस्कृति पर लगभग 300 लेख प्रकाशित हो चुके हैं साथ ही कुछ कहानियां भी।

एपिसोड 7: अमृता ठाकुर:

पत्रकार, सृजनात्मक लेखन में दिलचस्पी। अनुवादक और फ्रीलांस लेखक। हंस, पाखी आदि साहित्यिक पत्रिकाओं में कविता एवं कहानी प्रकाशित। जेंडर विषय पर विभिन्न संस्थानों के लिए रिसोर्स पर्सन के तौर पर वर्कशॉप का संचालन।


एपिसोड 8: विधुरिता पटनायक:

छत्तीसगढ़ में जन्मी, पली-बढ़ी, स्कूली शिक्षा के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में बीए। शादी के बाद मुंबई से हिंदी साहित्य में एमए। हिंदी में लिखने और पढ़ने का जुनून। 1993 से 2012 तक टाइम्स ऑफ इंडिया, मुंबई के मार्केटिंग डिविजन में कार्यरत। इन दिनों लेखन के प्रयास में संलग्न।

एपिसोड 9: अभिषेक मेहरोत्रा:

खबरों को खोजने का पैशन रखने वाले अभिषेक मेहरोत्रा उन चुनिंदा पत्रकारों में है जो आज के युग के मीडिया यानी वेब जर्नलिज़म के अच्छे जानकार माने जाते हैं। अमर उजाला, दैनिक जागरण और नवभारतटाइम्स ऑनलाइन के बाद पिछले तीन सालों से वे मीडिया स्ट्रीम से जुड़ी वेबसाइट समाचार4मीडिया डॉट कॉम में संपादकीय प्रभारी।  

एपिसोड 10: रिंकी वैश्य:

लेखक, पत्रकार, अनुवादक। अभी एक प्राइवेट कंपनी में लिंग्विस्ट के पद पर कार्यरत। करियर की शुरुआत 'अमर उजाला' अखबार से। फिर टाइम्स इंटरनेट लिमिटेड के साथ डिजिटल मीडिया का अनुभव, लंबे विराम के बाद पिछले साल सबटाइटलिंग की दुनिया से एक नयी शुरुआत।

एपिसोड 11: कमलेश पाठक:

प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव, ऑल इंडिया रेडियो। अंतरराष्ट्रीय साहित्य पढ़ना और स्वांत: सुखाय के लिए लिखना। राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं और आकाशवाणी के लिए विभिन्न विधाओं में लेखन।


एपिसोड 12: शिल्पा शर्मा:

पोस्टग्रेजुएशन इलेक्ट्रॉनिक्स में और मन रमता है लेखन में। पिछले 16 वर्षों से मीडिया के विभिन्न संस्थानों में कार्य का अनुभव। कई कहानियां व कविताएं देशभर के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। फ़ेमिना हिंदी का 9 वर्षों तक सम्पादन। फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन।

एपिसोड 13: रूपा दास:

पिछले बीस वर्षों से मीडिया प्रोफेशनल। कई चैनलों में उच्च पदों पर काम करने के बाद, सोनी, जी, जूम आदि के लिए टॉप रेटेड शोज हिना, सीआईडी, दुल्हन, बेटियां आदि का निर्माण। हाल ही में मणिपुर के चाइल्ड सोल्जर्स डाक्यूमेंट्री का प्रोडक्शन और कांसेप्ट लेखन।


एपिसोड 14: राजलक्ष्मी:

स्वतंत्र पत्रकार और अनुवादक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित तौर पर लेखन। पढ़ने का शौक। वर्तमान में उपन्यास 'एक थी शारदा' के लेखन में व्यस्त।

एपिसोड 15: ध्यानेंद्र त्रिपाठी:

उत्तरप्रदेश के छोटे से शहर बरपुर में जन्म, बीएचयू से स्नातक, आईआईटी(आईएसएम) धनबाद से प्रौद्योगिकी स्नातक और सिटी एंड गिल्ड्स लंदन से परास्नातक। संप्रति आस्ट्रेलियाई एमएनसी में भारतीय इकाई के प्रबंधक। बच्चों की रचना पराग, नंदन आदि में प्रकाशित। हंस, कथादेश, नया ज्ञानोदय और तमाम समाचार पत्रों में रचनाएं प्रकाशित। पहले भोजपुरी अवधी लोक संगीत अल्बम का 2017 में लोकार्पण। लेखन, अभिनय  संगीत, अंतरिक्ष विज्ञान, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में गहरी रुचि। 

एपिसोड 16: हरीश पाठक:

मूलत: कथाकार। दैनिक स्वदेश से पत्रकारिता की शुरुआत। मुक्ता, धर्मयुग, कुबेर टाइम्स, हिन्दुस्तान, एकता चक्र, पूर्ण विराम, राष्ट्रीय सहारा सहित 40 साल की पत्रकारिता में 21 साल तक संपादक। चार कहानी संग्रह, दो पत्रकारिता की पुस्तकें। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत।

एपिसोड 17: इरा टाक:

फिक्शन राइटर, फिल्म मेकर और पेंटर जयपुर की इरा इन दिनों मुंबई में रहती हैं। शॉर्ट फिल्म इवन द चाइल्ड नोज, फर्ल्टिंग मैनिया और डब्ल्यू टर्न चर्चित। चार किताबें अनछुआ ख्वाब, मेरे प्रिए (कविता संग्रह), रात पहेली (कहानी संग्रह), रिस्क @ इश्क प्रकाशित। इस साल एक और कहानी संग्रह प्रकाश्य। विभिन्न गैलिरयों में 8 सोलो पेंटिंग एग्जीबिशन। इंडिया एब्रॉड के पर्सनल कलेक्शन में पेटिंग शामिल।

एपिसोड 18: सुमन बाजपेई:

लेखक, पत्रकार, अनुवादक। इस समय चिल्ड्रंस बुक ट्रस्ट में हिंदी संपादक। पूर्व में जागरण सखी, मेरी संगिनी व फोर्थ डी वुमेन में विभिन्न संपादकीय पदों पर कार्य। 10 पुस्तकें, 4 कहानी संग्रह प्रकाशित। 70 से अधिक पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद।

एपिसोड 19: सुमिता चक्रवर्ती:

तीस सालों से मार्केटिंग प्रोफेशनल। पटना में टाइम्स ऑफ इंडिया से होते हुए कुछ साल अमेरिका में बिताने के बाद अमर उजाला के मार्केटिंग विभाग से संबद्ध। पिछले दस सालों से विभिन्न न्यूज चैनलों में एनालिस्ट और रिसर्चर।


एपिसोड 20: सोनाली मिश्रा:

लेखक, अनुवादक। इस समय हिंदी पत्रिका 'डायलॉग इंडिया' में डेप्युटी एडिटर। इग्नू से अनुवाद में शोधरत। अब तक कुल पांच पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद। बाल कहानी का संग्रह शीघ्र प्रकाश्य।

एपिसोड 21: प्रिया सिंह:

मेरठ में गृहिणी और गर्ल्स हॉस्टल की संचालिका। हिंदी का अच्छा साहित्य मन को भाता है। पढ़ने-पढ़ाने की शौकीन। गर्ल्स हॉस्टल को लेकर एक उपन्यास लिखने की योजना।


एपिसोड 22: सना समीर:

क्रिएटिव मीडिया स्ट्रैटजिस्ट। मास कम्युनिकेशन में पीएचडी और गोल्ड मैडलिस्ट। 10 साल से रेडियो और मीडिया में कार्यरत। कहानी और कविताओं का संग्रह परदेस के मौसम प्रकाशित। क्रिएटिव राइटिंग के लिए आईसीसीआर और अन्य संस्थानों द्वारा पुरस्कृत।

एपिसोड 23: अमरेंद्र यादव:

जौनपुर, उत्तर प्रदेश में शुरुआती पढ़ाई के बाद मुंबई विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में ग्रेजुएशन। भटककर पत्रकारिता की राह पकड़ी। नौ वर्षों से टाइम्स ऑफ़ इंडिया की पत्रिका 'फ़ेमिना' (हिंदी) में कार्यरत। कविताएं फ़ेसबुक के लिए और कहानियां फ़ेमिना के लिए लिखते हैं। पसंदीदा शौक-किताबों की जमाखोरी।

एपिसोड 24: शिल्पी रस्तोगी:

वर्तमान में सीनियर कंटेट क्रियेटिव राइटर। लेखन का शौक। कई कहानियां व लेख विभिन्न समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित अचर्चित लेखिकाओं की चर्चित कहानियांनाम से एक कहानी संकलन प्रकाशित। डीडी न्यूज में वॉयस ओवर आर्टिस्ट।

एपिसोड 25: तुषार:

यूएई में पला बढ़ा और अब बुड़ापेस्ट से साइकोलॉजी में ग्रेजुएशन का कोर्स कर रहे हैं। बीस साल की उम्र में लगता है दुनिया देख ली। बेला का एक एपिसोड लिखने को मिला तो लगता है आगे लेखन में भी हाथ आजमाएंगे।


एपिसोड 26: गायत्री राय:

बनारस से एमबीए के बाद आईटी सेक्टर में कार्यरत। मन पढ़ने-लिखने में खूब रमता है। और सबसे पसंदीदा काम है किताबों की दुनिया के लहरों से उलझना  

एपिसोड 27: शुचिता मित्तल:

पत्रकारिता से करियर की शुरुआत। पिछले पंद्रह सालों से फ्रीलांस अनुवादक और लेखक। अनुवाद की कई पुस्तकें पुरस्कृत।


एपिसोड 28: पीयूष जैन:

हरियाणा में जन्म, दिल्ली में स्कूली पढ़ाई और फिर बिट्स पिलानी से इंजीनियरिंग। अब बेंगलुरु में जुनिपर नेटवर्क में नौकरी।अब तक विचार कुलबुलाते थे, कागज पर पहली बार ही शब्दों ने आकार लिया। शांत जगहों पर घूमना और टेनिस खेलना पसंद।

एपिसोड 29: नलिनी:

पढ़ने की गजब की शौकीन। खासकर डिटेक्टिव उपन्यास। अपने करीबियों की बेहतरीन आलोचक। शौकिया लेखक।


एपिसोड 30: सुदर्शना द्विवेदी:

आठ वर्ष अंग्रेज़ी में व्याख्याता रहने के बाद,पिछले चालीस से अधिक वर्षों से पत्रकारिता में। इंडियन एक्सप्रेस ,पीटीआई के बाद धर्मयुग और नवभारत टाइम्स में सहायक संपादक। अन्यान्य  पत्र- पत्रिकाओं और वेबसाइट में  हिंदी और अंग्रेज़ी में लेखसाक्षात्कार और कहानियां प्रकाशित। नवभारत टाइम्स में वर्षों तक दो कॉलम 'आधी दुनिया की ख़बरें' और 'नज़र' का लेखन। दो फ़िल्म और अनेक धारावाहिकों का लेखन। संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।

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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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