राजीव शुक्ला ने उठाया पत्रकारों की सैलरी में इतनी बड़ी असमानता का मुद्दा...

राजीव शुक्ला ने उठाया पत्रकारों की सैलरी में इतनी बड़ी असमानता का मुद्दा...

Saturday, 24 February, 2018

रुहैल अमीन ।।

एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (ENBA) का दसवां एडिशन 10 फरवरी को नोएडा के होटल रेडिसन ब्‍लू में धूमधाम से मनाया गया। इस मौके पर वरिष्‍ठ राजनेता और ‘इंडियन प्रीमियर लीग’ (IPL) के चेयरमैन राजीव शुक्‍ला ने बताया कि आने वाले दिनों में टीवी न्‍यूज का भविष्‍य कैसा होगा। उन्‍होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि किस तरह से समकालीन न्‍यूज मीडिया के परिदृश्‍य में बदलाव की जरूरत है।

राजीव शुक्‍ला ने कहा, ‘आजकल पत्रकारिता काफी बदल गई है और अब यह महत्‍वपूर्ण लोगों के निकट ही घूम रही है। इससे पहले यह होता था कि राजनेता कवरेज के लिए पत्रकारों के पीछे भागते थे लेकिन अब यह उल्‍टा हो गया है। पहले हम लोगों को ज्‍यादा तवज्‍जो दी जाती थीलेकिन अब उन लोगों की मांग ज्‍यादा है। अब समय आ गया है कि पत्रकारिता के उसी रूप को वापस लाने के लिएजिसके लिए यह जानी जाती हैआत्‍ममंथन करें। मीडिया में इस समय काफी असमानता है और हमें इन्‍हें देखने की और आज के समय के अनुसार इन्‍हें दूर करने की जरूरत है।

कार्यक्रम में राजीव शुक्‍ला ने स्‍वतंत्र पत्रकारिता की जरूरत पर भी बल दिया। उन्‍होंने कहा, ‘मेरा मानना है कि न्‍यूज चैनलों को किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव में नहीं आना चाहिए और इन सबसे मुक्‍त होना चाहिए। मैं आपको ‘न्‍यूज24’ का एक उदाहरण दे सकता हूं। कभी भी किसी राजनीतिक दल ने चैनल पर पक्षपाती होने का आरोप नहीं लगाया है। मेरा मानना है कि मीडिया के लिए यह जरूरी है कि उस पर किसी भी तरह का दबाव न हो और वह सही तथ्‍यों पर रिपोर्टिंग करेफिर चाहे वह किसी भी राजनेता से किसी न किसी रूप में जुड़ा ही क्यों न हो।

कार्यक्रम के दौरान राजीव शुक्‍ला ने वर्तमान सरकार को भी एक सलाह दे डाली। उन्‍होंने कहा कि वर्तमान सरकार के राजनेता मीडिया के साथ उस तरह की बात नहीं करते हैंजिस तरह यूपीए सरकार करती थी। राजीव शुक्‍ला ने कहा, ‘मैं कहूंगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नियमित तौर पर मीडिया से उसी तरह बातचीत करनी चाहिएजिस तरह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी किया करते थे। मीडिया के प्रश्‍नों से बचना सही तरीका नहीं हैबल्कि उसके साथ जुड़ना सही दृष्टिकोण है।

राजीव शुक्‍ला ने कहा कि भारत में सभी लोगों के पास स्‍कोप है। 130 करोड़ लोगों की आबादी वाले इस देश में न्‍यूज चैनलटीवी न्‍यूज चैनलप्रिंट मीडिया और डिजिटल मीडियासभी के पास पूरे मौके हैंक्‍योंकि यहां पर लोगों की पाठकों की और व्‍यूअर्स की कोई कमी नहीं है और आप लोगों के बीच आसानी से समायोजित हो सकते हैं। ऐसे में यदि हम भारतीय मीडिया की बात करें तो यह स्थिति बहुत प्रोत्‍साहित करने वाली है। चूंकि यहां पर काफी स्‍कोप है ऐसे में आप आगे बढ़ सकते हैं। 'केपीएमजीकी रिपोर्ट के अनुसारअनुमान लगाया गया है कि टेलिविजन न्‍यूज चैनल का मार्केट 14 प्रतिशत बढ़ रहा है। इसके बाद प्रिंट मीडिया का नंबर है और इसमें ग्रोथ भी करीब नौ प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है। डिजिटल मीडिया तीसरे नंबर पर है। लेकिन मेरा मत इससे अलग है। मेरा मानना है कि डिजिटल मीडिया तेजी से आगे बढ़ रहा है। हालांकि मौद्रीकरण की बात करें तो डिजिटल मीडिया को उतनी कमाई नहीं हो रही है लेकिन इसकी आगे बढ़ने की रफ्तार काफी तेज है। आजकल लगभग सभी न्‍यूज चैनल इसकी ओर खासा ध्‍यान दे रहे हैं और डिजिटल मीडिया डिपार्टमेंट पर उनका ज्‍यादा जोर है।

एक टेलिविजन चैनल तो 100 करोड़ का रेवेन्‍यू हर साल डिजिटल मीडिया की बदौलत ले रहा है और यह रेवेन्‍यू दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। कुल मिलाकर कहें तो डिजिटल मीडिया चारों ओर छाया हुआ है और आज के समय में कोई भी तबका इससे अछूता नहीं है। यदि आप कोई न्‍यूज चैनल चला रहे हैं तो आप भारतीय और एनआरआई दर्शकों तक ही अपनी पहुंच बना सकते हैं लेकिन डिजिटल मीडिया में ऐसा नहीं है और पूरी दुनिया के व्‍युअर्स तक आसानी से पहुंच सकते हैं। 

मुझे लगता है कि डिजिटल मीडिया के साथ सिर्फ यही एक परेशानी है कि इसकी जवाबदेही ज्यादा नहीं है। कोई भी व्‍यक्ति किसी के खिलाफ भी कुछ भी लिख सकता है। कई बार यह बहुत गलत होता हैक्‍योंकि इसमें जब कोई यदि आपको परेशान कर रहा हैआपकी बेइज्‍जती कर रहा है लेकिन आप कुछ नहीं कर सकते हैं। मैंने इस बारे में साइबर कानून आदि देखने की कोशिश भी की तो पता चला कि इसमें अदालत का आदेश है और आप कुछ नहीं कर सकते हैं। ऐसे में कौन व्‍यक्ति रोजाना कोर्ट जाता है और वहां की कार्यप्रणाली से सभी लोग भलीभांति परिचित हैं। किसी व्‍यक्ति के खिलाफ अदालत से कोई आदेश लेने में वर्षों निकल जाते हैं। ऐसा होना काफी मुश्किल हैइसलिए इस दिशा में हमें कुछ जरूर करना चाहिए।

हमारी सरकार में भी साइबर कानून पर काम किया गया था। इससे पहले भाजपा नेता प्रमोद महाजन ने भी इस दिशा में कुछ प्रयास किए थेहालांकि वे इसमें सफल नहीं हो पाए थे। बाद की सरकारों ने भी इस बारे में काफी काम किया लेकिन यह उतना मजबूत नहीं बन पाया। ऐसे में सरकार को भी कुछ ऐसा उपाय निकालना चाहिए जिससे जवाबदेही तय की जा सके और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता बनी रह सके। यदि हम इंडियन टेलिविजन इंडस्‍ट्री और इंडियन मीडिया इंडस्‍ट्री की बात करें तो इस समय यह करीब 19.60 बिलियन डॉलर है और वर्ष 2012 तक इसके 37 बिलियन डॉलर त‍क पहुंचने की उम्‍मीद है। यदि रिस्‍पॉसिबिलिटीअकाउंटिबिलिटी और क्रेडि‍बिलिटी होना बहुत जरूरी है।

इस समय सबसे ज्‍यादा रेवेन्‍यू एंटरटेनमेंट इंडस्‍ट्री से आ रहा है। इससे सबसे मुश्किल काम डिस्‍ट्रीब्‍यूशन का है। ब्रॉडकास्‍टर के सामने डिस्‍ट्रीब्‍यूशन सबसे बड़ी समस्‍या है। कुछ ब्रॉडकास्‍टर्स के पास अपना डिस्‍ट्रीब्‍यूशन प्‍लेटफॉर्म है जबकि कुछ ब्रॉडकास्‍टर्स के पास अपना डिस्‍ट्रीब्‍यूशन प्‍लेटफॉर्म नहीं है। य‍ह सबसे बड़ी चुनौती है। इसमें टेक्‍नोलॉजी को लेकर रिस्‍क भी है क्‍योंकि हर दो-तीन साल में टेक्‍नोलॉजी बदल जाती है। अभी जो एमएसओ और डीटीएच प्‍लेटफॉर्म चल रहे हैंकौन जानता है कि यह आने वाले समय में शून्‍य हो जाएं और कुछ दूसरी तरह के जियो या दूसरे टाइप पूरे मार्केट पर छा जाएं। ऐसे में मेरा मानना है कि सरकार को इस दिशा में जरूर कुछ काम करना चाहिए।

यदि हम दुनिया की बात करें तो मैंने देखा कि वे ब्रॉडकास्‍टर्स पर ज्‍यादा ध्‍यान देते हैं और डिस्‍ट्रीब्‍यूशन के द्वारा उन्‍हें काफी रेवेन्‍यू मिलता है। लेकिन भारत में वह मॉडल नहीं हैंयहां तो ब्रॉडकास्‍टर्स डिस्‍ट्रीब्‍यूशन को भुगतान करने के लिए बाध्‍य होते हैं। हमारे देश में अधिकांश खर्च तो डिस्‍ट्रीब्‍यूशन में हो जाता है। ऐसे में उन्‍हें मुश्किल से ही मुनाफा हो पाता है। यदि उन्‍हें प्रॉफिट नहीं मिलता है तो वे टीआरपी पर चल रहे हैं। इन परिस्थितियों में ज्‍यादा से ज्‍यादा टीआरपी हासिल करने के लिए वे 'लक्ष्‍मणरेखाका उल्‍लंघन करते हैं। यही कारण है कि चैनलों पर एंकर जोर-जोर से चिल्‍लाते हैं अथवा चैनलों पर शो में हंगामा होता है। आखिर ऐसा क्‍यों हो रहा हैदअरसलवे रेटिंग हासिल करना चाहते हैं। ऐसे में क्रेडिबिलिटी का सवाल पैदा हो जाता है। इस रेटिंग के चक्‍कर में ही क्रेडिबिलिटी प्रभावित हो रही है। आखिर अरनब गोस्‍वामी क्‍या करते हैंवे भी ज्‍यादा से ज्‍यादा रेटिंग हासिल करना चा‍हते हैं। 'टाइम्‍स नाउऔर 'रिपब्लिकमें भी सिर्फ रेटिंग को लेकर ही प्रतिस्‍पर्द्या है। हिन्‍दी चैनलों की बात करें तो वहां पर भी यही स्थिति है। वे भी रेटिंग हासिल करना चाहते हैं। ऐसे में इस स्थिति के पीछे रेटिंग और टीआरपी का ही मूल दोष है और इससे टेलिविजन इंडस्‍ट्री की ग्रोथ भी प्रभावित हो रही है। टेलिविजन व्‍युअर्स और सभी स्‍टेकहोल्‍डर्स के बीच भी यही मुद्दा है। यदि क्रेडिबिलिटी कम हो जाती है तो स्‍वाभाविक रूप से रेटिंग भी कम हो जाएगी। इस पर लोग टेलिविजन देखना बंद कर देंगे और फिर प्रिंट मीडिया का रुख कर लेंगे।

राजीव शुक्‍ला ने कहा, 'प्रिंट में कुछ सिद्धांत होते हैं और वे हमेशा इसका पालन करते हैं। मुझे यह बात इसलिए पता है कि मैंने भी प्रिंट मीडिया और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया दोनों में काम किया है। 200 पत्रकारों की प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में कोई नेता संवेदनशील बात बताता है और यह भी कहता है कि ये बात ऑफ द रिकॉर्ड है तो कोई पत्रकार उसे प्रकाशित नहीं करेगा। लेकिन क्‍या आज टेलिविजन में ऐसा किया जा सकता है। आपस में हुई निजी बातों को भी दिखा दिया जाता है। इसलिए कहा सकता है कि मीडिया के कवरेज को लेकर काफी बदलाव आया है।

पार्लियामेंट के सेंट्रल हॉल में अनकहा एक नियम हैजिसके बारे में हालांकि स्‍पीकर ने आदेश नहीं दिया हैलेकिन सभी लोग उसका पालन करते हैं। वह नियम यह है कि यदि सेंट्रल हाल में कुछ सदस्‍य आपस में किसी भी मुद्दे पर बात कर रहे हैं तो उसे कभी भी रिपोर्ट नहीं किया जाता है। लेकिन आखिर आजकल ऐसे सिद्धांत कहां हैं। आजकल तो स्टिंग जर्नलिज्‍म को बढ़ावा दिया जा रहा है। यदि ऊपर दिए गए मेरे उदाहरणों को छोड़ भी दें तो आज तो ये हाल है कि यदि आप किसी से कुछ बात कर रहे हैं तो पता नहीं कौन उसका स्टिंग कर ले और कब वह चारों ओर फैल जाए। आज के समय में ये बहुत बड़ी समस्‍या है। ऐसे में सभी नेतानौकरशाह और सेलिब्रिटी कहीं पर भी कुछ बोलते हुए डरे रहते हैं कि पता नहीं कौन उनका स्टिंग कर ले और बात का बतंगड़ बन जाए। ऐसे में प्राइवेसी का सवाल उठता है। आखिर क्‍यों प्राइवेसी का और क्रेडिबिलिटी का सवाल उठता है। यह सब आज के माहौल के कारण हो रहा है। यहां मीडिया के बहुत सारे लोग बैठे हैंजिनमें जर्नलिज्‍म के छात्र और मीडिया कंपनियों के कई स्‍टेकहोल्‍डर्स भी शामिल हैंउन सभी को अपने कंधे पर ये जिम्‍मेदारी उठानी होगी। अगर साख चली गई तो कुछ नहीं बचेगा। सिर्फ विश्‍वास का संकट है। इसलिए ये बहुत जरूरी है। यहां मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता क्‍योंकि हमारे सबसे रिश्‍ते हैं और अच्‍छे रिश्‍ते हैं। अभी किसी ने बोला कि अरनब गोस्‍वामी कैमरे के बाहर इतने बढ़िया आदमी हैं कि पूछो मतफिर कैमरे पर क्‍या हो जाता है। वो कोई शाहरुख खान का कोई डायलॉग थोड़े ही है जो पढ़कर बोलना पड़ता है। दरअसलयह सब रेटिंग या टीआरपी के लिए होता है। फिर उसमें धीरे धीरे राजनीतिक झुकाव शामिल होता जाता है।'

राजीव शुक्‍ला का कहना था, 'मैं भी पत्रकार थामैंने करीब बीस साल पत्रकारिता की है और मेरे भी कई लोगों के साथ इस तरह के भावनात्‍मक व पारिवारिक रिश्‍ते थे। राजीव गांधी से रिश्‍ते थेअटल बिहारी जी से रिश्‍ते थे और वे घर पर भी आते थे। लेकिन आज की तारीख में दो किस्‍म के पत्रकार हो गए हैं। एक पत्रकार रहकर राजनीतिज्ञ की तरह काम करता है और एक वे हैं जिन्‍होंने चुना है कि उन्‍हें यदि कोई नेता अच्‍छा लगता है या कोई राजनीतिक दल अच्‍छा लगता है वे पत्रकारिता छोड़ देंगे और खुले तौर पर उनके साथ चले जाएंगे। मेरे ख्‍याल से दूसरा रास्‍ता बेहतर है। मैं भी यही मानता हूं और मैंने सोच लिया था कि ऐसा नहीं करेंगे कि पत्रकार रहते हुए ऊपर से पत्रकार बने रहेंगे और अंदर-अंदर राजनीतिक दल से जुड़े रहेंगे। यह तो एक तरह का धोखा हो गया अपने व्‍युअर्स और रीडर्स के साथ। यदि किसी पत्रकार को राजनीति में आना है तो उसे खुले तौर पर आ जाना चाहिए। इस तरह के लोगों की संख्‍या बहुत बढ़ रही है जो ऊपर से तो पत्रकार हैं और नीचे से राजनेता बने हुए हैं।'

ऐसे लोगों का नाम पूछे जाने पर राजीव शुक्‍ला का कहना था, 'ऐसे लोगों की संख्‍या बहुत बढ़ गई है। एक-दो होते तो मैं बता देता वैसे सभी को इसके बारे में पता है। इससे आप अपने दर्शक को धोखा दे रहे हैं और अपने पाठकों को धोखा दे रहे हैं। मेरा मानना है कि यदि आप पॉलिटिकल जर्नलिस्‍ट हैं तो आप आधे राजनीतिज्ञ तो वैसे ही बन गए क्‍योंकि आप रात-दिन उनके साथ रहते हैं। लेकिन आपका ये हुनर होना चाहिए कि उनके साथ रहते हुए अपने काम करना न कि उनकी तरह काम करना। आईएएस अधिकारी को स्‍टील फ्रेम इसलिए कहा जाता है कि वे एक हद तक पॉलिटिकल प्रेशर अपने ऊपर लेते हैं लेकिन काम नियम-कायदों के हिसाब से करते हैं। हालांकि ये स्‍टील फ्रेम आजकल रबर फ्रेम होता जा रहा है। यह काम पत्रकारों का करना है। बेशक वे कैसे भी माहौल में रहें लेकिन जब स्‍टोरी लिखने बैठें तो सिर्फ अपने विवेक से बिना किसी से प्रभावित हुए काम करें। हालांकि ऐसा हो नहीं रहा है। इसलिए तो ऐसे सेमिनार आयोजित होते हैं और ये बात करने की नौबत आई। मैं आलोक जी की बात से सहमत हूं कि बहुत प्रेशर होता था लेकिन तब दूसरी तरह का प्रेशर होता था। आज उल्टा हो गया है। आजकल मालिक खुद खड़े रहते हैं कि आप प्रेशर तो डालो हम तैयार हैंयह स्थिति ठीक नहीं है। क्‍यों‍कि जब ऐसा रिपोर्टर अपने ऑफिस जाता है तो उसकी वैल्‍यू मालिक और एडिटर के बीच इस बात को लेकर आंकी जाती है कि यह किसके नजदीक है। मैं इस तरह की स्थिति को साख पर संकट से जोड़ता हूं। अब मीडिया बहुत विस्‍तार कर गया है। पहले सैकड़ों पत्रकार होते थे और अब इनकी संख्‍या हजारों में है। मुझे याद है कि जब मैं रूबरू के नाम से इंटरव्‍यू करता था तो बड़े-बड़े नेता कहते थे कि मेरा भी इंटरव्‍यू कर लो। एक बड़े नेता तो छह महीने तक मुझे कहते रहे वे मेरे ऑफिस भी आते थे लेकिन तब हम तय करते थे कि किसका इंटरव्‍यू करना है। आज तो यह हाल है कि छोटे नेता भी परेशान हैं कि आखिर किसे इंटरव्‍यू देंपचासों अप्‍लीकेशन पड़ी हुई हैं। आज सब उलट गया है और पत्रकार की सफलता की कुंजी ये हो गई है कि वह किसका इंटरव्‍यू लेकर आता है। मैं आज यहां पूर्व पत्रकार होने के नाते बोल रहा हूं। आजकल जो वार्षिक कार्यक्रम कॉन्‍क्‍लेव होते हैंउनमें गेस्‍ट को-ऑर्डिनेटर का पद भी शामिल कर लिया गया है जबकि पहले इस तरह का कोई पद ही नहीं होता था। ऐसे लोगों का काम एक से एक लोगों को चैनल पर लाना है। अब ऐसे लोगों ने देखा कि उनकी इतनी वैल्‍यू है तो उन्‍होंने पैसे लेने शुरू कर दिया जबकि पहले लोग खुद आने को तैयार रहते थे। आज किसी भी क्रिकेटर को शो में बुला लोको-ऑर्डिनेटर ले आएगा जबकि पहले ऐसा नहीं था। ऐसा ही हाल फिल्‍म इंडस्‍ट्री का हो गया है। पहले उभरते हुए कलाकार पत्रकारों को साधकर रखते थे लेकिन आज तो उनके साथ धक्‍का-मुक्‍की तक होने लगी है। पहले हम इन प्रश्‍नों का जवाब सोचना पड़ेगा कि कैसे हम अपनी गरिमा और गौरव को बचाकरअपनी शान बचाकर रखना है।'

राजीव शुक्‍ला का कहना था, 'अब बात आती है कि तनख्‍वाह की। आप प्रिंट मीडिया के पत्रकार की तनख्‍वाह देख लो और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार की तनख्‍वाह देख लो। दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। एक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के वकील की तरह है और एक जिला अदालत के वकीलों की तरह है। दो साल काम करने के बाद इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया का पत्रकार अपने आपको सीनियर कहता है जबकि प्रिंट में 20 साल तक काम करने के बाद भी वहां का पत्रकार अपने आपको सीनियर नहीं कह पाता है। ऐसे में प्रिंट मीडिया के वे लोग जो इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में काम करने में भी सक्षम हैंवे प्रिंट छोड़कर वहां जा रहे हैं। मीडिया में इस तरह की चीजें बहुत हो रही हैंइसलिए मैंने उनका यहां जिक्र किया है। इसलिए इस तरह के मुद्दों को उठाने की जरूरत है। हम लोगों को आत्‍मचिंतन करना पड़ेगा। ये अच्‍छा विचार है कि मीडिया में सेल्‍फ रेगुलेशन होना चाहिए लेकिन क्‍या सिर्फ इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में ही होना चाहिए। आलोक जी और मैं दोनों प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के मेंबर रह चुके हैं लेकिन काउंसिल बिना दांत वाला शेर हैक्‍योंकि उसके पास किसी तरह की कार्रवाई का अधिकार नहीं है। वहां पर मीडिया द्वारा टेलिविजन रेगुलेटरी बॉडी गठित की गई लेकिन वह भी अपने उद्देश्‍य में सफल नहीं हुई। उसमें कोई एक-दूसरे की सुनता ही नहीं है और डिजिटल मीडिया की कोई रेगुलेटरी बॉडी ही नहीं है। कोई भी कुछ भी कर सकता है। इसलिए मेरे ख्‍याल से ये मौका है जब हम सब लोगों को सोचना पड़ेगा। इसके बारे में विचार करना होगा और अपने आप को बचाके यानी अपनी गरिमा और इज्‍जत बचाकर चलना पड़ेगा।'     

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