एंकर कविता बोलीं- जब रात 10 बजे मेरे बुलेटिन से महिला पत्रकार लंकेश की मौत की खबर ब्रेक हुई तो...

एंकर कविता बोलीं- जब रात 10 बजे मेरे बुलेटिन से महिला पत्रकार लंकेश की मौत की खबर ब्रेक हुई तो...

Wednesday, 06 September, 2017

कविता सिंह

एंकर, इंडिया न्यूज ।।

ये सदमा है। ये झटका है। ये खौफ की दस्तक है। एक पत्रकार की घर में हत्या। बदमाशों में कानून का कोई डर नहीं? एक सोच के खिलाफ सालों से सीधी जंग जारी थी। आखिरी बार मंच से यही कहा कि पत्रकारों को जान से मारने की धमकी मिलनी आम बात हो चली है। आज गौरी लंकेश के बेंगलुरू स्थित घर में उन पर अज्ञात लोगों का हमला और करीब से गोली लगने से मौके पर ही उनकी मौत की दिल दहला देने वाली खबर रात 10 बजे मेरे बुलेटिन में ब्रेक हुई। संवाददाता बेंगलुरु से फोन पर जुड़ गए थे। टूटी फूटी हिंदी में लडखड़ाती जुबान से हर सवाल का जवाब दे रहे थे।

खबर को लेकर हर अपडेट सीधा दिमाग पर असर कर रहा था। फिर कुछ ऐसा हुआ कि सब शून्य हो गया। अचानक ख्याल आया कि स्टूडियो में बैठे जिस पत्रकार को किसी विवादास्पद सवाल पूछने तक की स्वतंत्रता नहीं। वो पत्रकार गौरी जैसी निर्भीक, निडर पत्रकार के बारे में बोलने या खबर के साथ इंसाफ करने लायक है भी या नहीं। गौरी लंकेश जिसने अपनी पत्रकारिता का लोहा मनवाया, सामने स्क्रीन पर तस्वीरों में जमीन पर पड़ा खून को धुंधला किया, उनका शरीर देख तकलीफ बढ़ती जा रही थी। जो सच को सीना ठोककर सच ना कह पाए। जिसकी जुबान बंदिशों, बेड़ियों में जकड़ी हो। वो गौरी जैसा होने के सपने देख सकता है। गौरी कैसे बने? उन्हें तो हुनर और हिम्मत विरासत में मिली थी। यहां संघर्ष का बेहद लंबा रास्ता तय कर यहां तक आये। खानदान में कोई हम जैसा ना था, ना है। लेकिन हम गौरी जैसे क्यों नहीं? कभी उसपर भी बिंदुवार तरीक़े से तथ्य रखे जाएंगे। लेकिन आज गौरी लंकेश के साहस को सलाम करने का दिन है।

कल लोग हाथ में मशाल, मोमबत्ती लेकर शायद सड़कों पर निकलेंगे। इंसाफ के लिए आवाजें उठें। लेकिन आज वक्त आत्मचिंतन का है। अगर ये असहिष्णुता है तो इस पर गहराई से वार और विचार करने का है। राय सही या गलत हो सकती है। लेकिन राय रखने पर पाबंदी नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अगर इतना कमजोर हो गया तो सोचिये राष्ट्रनिर्माण की दिशा में आगे नहीं हम बहुत पीछे चले जायेंगे। गोदी मीडिया, बिकी हुई मीडिया, बिके हुए पत्रकार, दलाल पत्रकार। इतनी हौसला अफजाई के बीच कुछ 'शहीद' पत्रकार भी हैं। ये आम आदमी को ही नहीं हम जैसे पत्रकारों को भी साहस देते हैं। कोई हिम्मत के साथ, पूरी निष्ठा के साथ पत्रकारिता का धर्म निभाते-निभाते 'एक' दिन शहीद हुआ। हम जैसे शायद 'रोज' सौ-सौ मौत मरते हैं।

'बोल के लब आज़ाद हैं तेरे'.....वाकई????

सलाम गौरी।


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