एंकर कविता सिंह बोलीं- एक वक्त मेरी ज़िंदगी में भी बहुत बुरा गुज़रा

Saturday, 09 September, 2017

कविता सिंह

एंकर, इंडिया न्यूज ।।

मैं उस मां के बारे में सोचूं तो सांस अटकने लगती है। दिल दर्द से भारी हो जाता है। एक एक पल कैसे पहाड़ सा बीत रहा होगा7 साल का जिगर का टुकड़ा स्कूल गया और लौटा उसका शव। गला रेता हुआ। स्कूल के वाशरूम से मिला। स्कूल भी इंटरनेशनल। पैसे भी पानी की तरह बहाये और भीतर ही बच्चा सुरक्षित ना रह पाया।

बस के कंडक्टर ने वाशरूम में उसके साथ दुष्कर्म की कोशिश की, मासूम चीखा तो पकड़े जाने के डर से गला रेत दिया। 'गला रेत दिया'? आईएसआईएस के खूंखार आतंकी दहशत फैलाने के लिए ऐसा करते थे। हमने खबरें भी खूब चलाई। लेकिन एक बस कंडक्टर चाकू के साथ बच्चे के वाशरूम तक घुस जाए, ये कैसे मुमकिन है। ये कोई आम स्कूल नहीं रायन इंटरनेशनल स्कूल है। स्कूल प्रबंधन की तरफ से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आयी। कंडक्टर अशोक गिरफ्तार। उसने जुर्म कबूल लिया है। लेकिन स्कूल प्रबंधन अपना गुनाह कब कबूलेगा?

इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो गई? कंडक्टर का पुलिस वेरिफिकेशन क्यों नहीं कराया था? वो स्कूल में छोटे बच्चों के वाशरूम में बच्चे के साथ घुस कैसे गया? छोटे बच्चों के वाशरूम में कोई केयरटेकर क्यों नहीं था/थी? स्कूल में लगे ज़्यादातर सीसीटीवी कैमरे काम क्यों नहीं कर रहे थे? इतने सवालों के बीच भी एफआईआर में स्कूल का कोई जिक्र नहीं था। अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर। स्कूल ढाई ढाई लाख एक साल का वसूलते हैं अभिभावकों से। किस बात के लिए? किस सुविधा, सुरक्षा के लिए?

शिक्षा के मंदिर को पैसे उगाही का धंधा बना दिया है। सरकार को ऐसे स्कूल के खिलाफ कड़ा एक्शन लेना होगा। सवाल ये भी कि अशोक जैसे मानसिक रूप से बीमार लेकिन दिखने में सामान्य दरिंदों से मासूमों को कैसे बचाएं? कुछ करना होगा और बहुत जल्द क्योंकि देश का भविष्य खतरे में है।

प्रद्युमन की तस्वीर आंखों के सामने तैर रही है। नीला कोट जिस पर स्कूल का नाम। उसका मुस्कुराता चेहरा। जैसे हर ग़म का इलाज। ये जब स्कूल से लौटता होगा तो घर जैसे फिर से जी उठता होगा। इसकी शरारतें, इसकी मस्ती, इसकी ज़िद, इसका रूठना और फिर मान जाना। इसके लिए कितने सपने देखे होंगे मां बाप ने। हर दिन एक नई ख्वाहिश के साथ ये सुबह उठता होगा और मां बाप की ज़िंदगी को नए मायने मिल जाते होंगे। लेकिन आज सब खत्म। बस प्रद्युमन का सामान, उसकी निशानी और उसकी निर्मम हत्या का कभी ना खत्म होने वाला दर्द। लोग कहते हैं मां का दर्द एक मां ही समझ सकती है। लेकिन जिसने सौ सपने अजन्मे बच्चे के लिए देखे हों। और घर से लेकर भविष्य तक उसी के इर्द गिर्द बुन डाला हो। वो समझ सकती है कि जो मां 9 महीने कोख में रखने के बाद जन्म देने के दर्द को झेल प्रद्युमन को घर लायी होगी, 7 साल उसे सीने से लगाकर रखा उसका आज क्या हाल हो रहा होगा।

जिस बच्चे की एक हलचल पर नींद टूट जाती थी। बिन बोले जिसकी भूख प्यास सब समझ लेती थी। बच्चे को ठोकर लगती तो जैसे कलेजा मुंह को आ जाता। उस मां के जिगर के टुकड़े का गला रेता बेजान शरीर जब उसकी गोद में रखा गया होगा तो कैसे चीख पड़ी होगी वो। इस दर्द को सहना नामुमकिन है। एक वक्त मेरी ज़िंदगी में भी बहुत बुरा गुज़रा। लोग तसल्ली देते, हिम्मत से काम लेने को कहते। तो सहसा मेरे मुंह से यही निकलता मेरी तकलीफ भगवान नहीं समझ सकता, इंसान क्या समझेगा।एक-एक रात लगता दिल फटा जा रहा है। आंसुओं का सैलाब आ जाता लेकिन सीने का बोझ कम ना होता। मुझे वो दर्द की इंतेहा लगी। लेकिन आज इस मां के दर्द के आगे वो दर्द कितना बेमानी लग रहा है। हर औरत, हर मां, प्रद्युमन की मां की तकलीफ को आज महसूस कर रही होगी। हमारी ऊपरवाले से यही प्रार्थना है कि आपको ये दर्द बर्दाश्त करने की हिम्मत दे। इंसाफ देर सवेर मिल ही जायेगा। लेकिन बच्चे की कमी सालती रहेगी। आगे किसी और मां को इस दर्द से गुजरना ना पड़े इसलिए लापरवाह स्कूलों के खिलाफ संग्राम छेड़ें तक तक जब तक सरकार की नींद नहीं टूटती और ऐसे स्कूलों के खिलाफ सख्त एक्शन नहीं लिया जाता।

प्रद्युमन, आप इतने प्यारे हो कि जहां होगे वहां आप सबके चहेते होंगे। महफूज़ होंगे, बिना खौफ चहक रहे होंगे। हमें माफ करना हमने आपको उम्मीद और आकांशा का फ़लक तो दिया लेकिन दरिंदों से बचने के लिए सुरक्षा का कवच नहीं दे पाए।


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