पूर्व पत्रकार राजेश साहनी की मौत पर मीडिया मित्रों ने यूं किया याद...

पूर्व पत्रकार राजेश साहनी की मौत पर मीडिया मित्रों ने यूं किया याद...

Tuesday, 29 May, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

पूर्व पत्रकार व उत्तर प्रदेश एटीएस के एडिशनल एसपी राजेश साहनी ने मंगलवार को सर्विस पिस्टल से गोली मारकर खुदखुशी कर ली। एडीजी कानून-व्यवस्था आनंद कुमार ने बताया कि पुलिस टीम एटीएस मुख्यालय स्थित साहनी के कमरे में पहुंची तो वे जमीन पर पड़े मिले और सिर में गोली लगी थी। घटना मंगलवार दोपहर करीब 1 बजे हुई। मौके से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। आत्महत्या के कारणों का पता लगाने के लिए जांच की जा रही है। बता दें कि एटीएस में रहते हुए साहनी ने आतंकियों के खिलाफ कई बड़े ऑपरेशन को लीड किया था।

इस घटना से न केवल पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया, बल्कि मीडिया जगत में भी उन्हें याद किया जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय राजेश साहनी को याद करते हुए अपने लिखते हैं कि अच्छे लोग ही जल्दी क्यों चले जाते हैं - वो भी इस तरह .. यकीन नहीं होता। वे आगे लिखते हैं कि जब राजेश साहनी 95-96 में जी न्यूज के साथ थे, तब मैं जी न्यूज में एडिटर था। इसके बाद वे यूपी पुलिस से जुड़े। वे जी में वे असाइनमेंट डेस्क पर थे।

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने राजेश साहनी के पत्रकारिता के दिनों को याद करते हुए समाचार4मीडिया को बताया कि करियर की शुरुआत में वे बहुत ही अच्छे पत्रकारों में से एक थे और तब वे जी टीवी के साथ थे। उन्होंने कहा, अगर मुझे ठीक से याद है तो 95 के दौरान वे असाइनमेंट के साथ जुड़े हुए थे।  साहनी बहुत ही मृदुभाषी पत्रकार थे और ईमानदार व काम के प्रति पूरी तरह से समर्पित थे। वे प्रोफेशनल जर्नलिज्म को समझने वाले, अपने सरोकारों को समझने वाले और पत्रकारिता के एथिक्स को समझने वाले पत्रकारों में से एक थे। वे बहुत ही मिलनसार और अपने टाइम को लेकर हमेशा पंचुअल रहते थे।

उन्होंने बताया, वे उन पुरानी पीढ़ी के पत्रकारों में से एक थे जो तमाम पत्रकारों को साथ लेकर चलते थे और बाजारवाद की पत्रकारिता से दूर रहते थे और उसका सामना भी करते थे, जैसा कि आज के पत्रकारों में शायद ही देखने को मिलता है। हम लोगों से उनका रिश्ता बहुत अच्छा था। इसके बाद इनका चुनाव राज्य पुलिस सेवा में हो गया था। यहां भी उनकी छवि ईमानदार और एक धाकड़ पुलिस ऑफिसर की बनीं।

वहीं लखनऊ में एबीपी न्यूज के एडिटर पंकज झा ने बताया कि जी न्यूज में वे उस दौरा के पत्रकार थे, जब यहां उमेश उपाध्याय, रजत शर्मा, विनोद कापड़ी, शाजी जमां और आलोक वर्मा थे। वे असाइमेंट डेस्क जुड़े हुए थे। साहनी एक संवेदनशील पत्रकार थे और साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। साहित्यिक सम्मेलनों में वे बढ़चढ़कर हिस्सा लेते थे। पटना कॉलेज में पढ़ाई के दौरान भी वे डिबेट में हिस्सा लिया करते थे। उस दौरान पटना यूनिवर्सिटी में बहुत ज्यादा गुंडागर्दी हुआ करती थी, जिसका वे विरोध भी करते थे। वे बहुत मिलनसार थे और शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसने उनकी कभी बुराई की होगी।  

वहीं पूर्व वरिष्ठ पत्रकार विनोद कापड़ी ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए उन्हें अपने फेसबुक वाल पर श्रृद्धांजलि देते हुए लिखा कि-    

क्यों राजेश क्यों ?

आज दोपहर में जब राजेश के बारे में पंकज झा का मैसेज आया तो ऐसा लगा कि पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। तुरंत पंकज को फोन किया। उसने बताया कि अभी कुछ देर पहले ही राजेश ने अपनी सर्विस रिवाल्वर से खुद को गोली मार ली। कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करूं? फोन रखने के बाद मैंने फिर पंकज का मैसेज पढ़ा.. Rajesh Sahni committed suicide ...दोबारा पंकज को मैसेज किया और पूछा are you sure ..is he really died? पंकज का जवाब था: Though sad But it’s true.. 

पिछले तीन घंटे से यही सोच रहा हूं कि राजेश आखिर ये सब कैसे कर सकता है? राजेश ऐसा इंसान था ही नहीं। जितना मैं उसे जानता हूं या जानता था, उसके हिसाब से राजेश ऐसा कर ही नहीं सकता था। आखिर क्या हुआ होगा? यही सोच सोच कर परेशान रहा और कई दोस्तों को फोन लगाया.. किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इतना मिलनसार, जिंदादिल, हंसमुख रहने वाला लड़का आखिर आत्महत्या कैसे कर सकता है
राजेश 23 साल से मेरा मित्र था। पहली बार मैं उसे मिला अगस्त उसमें 1995 में, जब मैंने जी न्यूज में बतौर रिपोर्टर जॉइन किया और देखा कि न्यूजरूम के कोने में एक लड़का बहुत खामोशी से अपना काम करता है और चुपचाप घर चला जाता है। ये मेरी राजेश से पहली मुलाकात थी।

चूंकि वो असाइनमेंट में काम करता था और मैं रिपोर्टर था, इसलिए कुछ समय बाद राजेश के साथ खूब बात होने लगी। बहुत धीरे बोलता था। बहुत कम बोलता था और बहुत प्यार से बोलता था। असाइनमेंट के लोगों की आदत होती है कि वो जब तक शोर न करें किसी को पता नहीं चलता कि वो काम कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं लेकिन राजेश इन सब बुराइयों से दूर था। वो शांति से काम करने में यकीन रखता था और मेरे साथ उसका रिश्ता कुछ ऐसा बना कि कई बार जब मेरे पास कोई स्टोरी आईडिया नहीं होता था तो राजेश चुपके से कोई न कोई आईडिया मुझे पकड़ा देता था। यही से मेरी और उसकी दोस्ती की शुरुआत हुई और फिर कुछ साल बाद जब मैंने जी न्यूज छोड़ दिया तो मुझे पता चला कि राजेश ने भी TV का काम छोड़ करके UP पुलिस जॉइन कर ली है और वो अब CO हो गया है।

मुझे बहुत हैरानी हुई.. हैरानी हुई कि एक इंसान जो बहुत ही धीमे बोलता है। बहुत ही प्यार से बोलता है ..हमेशा किताबों में खोया रहता है.. हमेशा हमेशा दुनिया जहान की बातें करता रहता है, वो इंसान पुलिस में क्यों भर्ती हो गया? कुछ दिन के बाद मैंने राजेश को फोन किया और एक के बाद एक करके सारे सवाल पूछ डाले। वो बहुत देर तक हंसता रहा और फिर बोला कि यार घर वालों की बड़ी इच्छा थी कि वो मुझे वर्दी में देखें। लेकिन मेरी जिज्ञासा अभी भी खत्म नहीं हुई थी। मैंने उससे पूछा कि जितना मैं तुझे जानता हूं, मैंने तुझे आज तक एक बार भी ऊंची आवाज में बात करते नहीं सुना.. मैंने तेरे मुंह से आज तक एक भी गाली नहीं सुनी तो तू पुलिस ने कैसे काम करेगा और वो भी UP पुलिस में? तो उसका जवाब था कि यार कुछ लोग तो पुलिस में ऐसे भी होने चाहिए ना जो गाली ना देते हो..

इसके बाद राजेश से गाहे बेगाहे बात होती रही और मैं उसे हमेशा पूछता रहा कि तूने अब गाली देने सीखी या नहीं? तो हंसकर बताता था कि जब जरूरत पड़ती है तो थोड़ी बहुत दे लेता हूं ।

मुझे लगा कि राजेश कि ये पेशागत मजबूरी होगी कि उसके मुंह से कुछ अपशब्द निकल जाते होंगे लेकिन भीतर से अपशब्दों वाला राजेश कभी था ही नहीं..

अभी मुश्किल से दो महीने पहले राजेश से फोन पर कई बार लगातार बात हुई। पीहू से जुड़ा कुछ मसला था और मित्र होने के नाते मैं लगातार राजेश से ही बात कर रहा था और उसमें उसने मेरी काफी मदद भी की। हिम्मत भी बढ़ाई और हमेशा कहता था कि जिस तरह से तूने एक अलग रास्ता चुना है उससे मैं बहुत प्रेरित होता हूं और जब अभी 22 मई को पीहू की रिलीज की तारीख़ की घोषणा हुई तो मुझे याद है कि उस दिन राजेश ने एक ट्वीट भी किया था जिसमें उसने लिखा था कि उसे पीहू का बेसब्री से इंतजार है और वो मेरा नाम बड़ी स्क्रीन पर देखना चाहता है.. फिल्म को देखना चाहता है। मुझे अब तक यकीन नहीं हो रहा कि जो इनसान जिंदगी को बहुत ही जिंदादिल होकर जी रहा था, उसने आखिर आत्महत्या क्यों कर ली?

राजेश से जितनी बार भी मेरी बात हुई उससे एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वो अपनी पारिवारिक जिंदगी में बहुत खुश था। हमेशा परिवार की बात करता था और ये बताता था कि उसका जीवन बिलकुल ठीक चल रहा, है इसलिए मुझे और हैरानी हुई जब आज खबर मिली। कई दोस्तों को फोन लगाया। समझने की कोशिश की कि आखिर क्या हुआ होगा। फिलहाल किसी को भी अंदाजा नहीं है कि राजेश ने आत्महत्या क्यों की? लेकिन कुछ बातें जो पता चल रही है उसके मुताबिक ATS में रहते हुए पिछले कुछ समय से राजेश अपने उच्च अधिकारियों के दबाव में था। कुछ लोग ये भी बता रहे हैं कि वह विभाग में भ्रष्टाचार के किसी मामले की जांच कर रहा था और परेशान था.. कुछ लोग ये भी बता रहे हैं कि उन्हें छुट्टी भी नहीं मिल रही थी.. मैं नहीं जानता हूं कि ये बातें सच है या नहीं लेकिन मैं इतना जानता हूं कि इस देश ने और उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक पुलिस अफसर नहीं खोया है बल्कि एक बहुत ही शानदार इंसान भी खोया है।

मैंने उसे हमेशा कहा कि राजेश तू पुलिस के लिए एकदम अनफिट है.. मुझे समझ नहीं आता कि तेरे जैसे लोग पुलिस में खुद को ढाल कैसे पाते होंगे। वो हमेशा हंसता रहता था और यही जवाब देता था कि कभी कभी पुलिस में मेरे जैसे अनफिट लोगों को भी होना चाहिए.. ऐसे हंसमुख, अनफिट, मिलनसार, जिंदादिल पुलिस अफसर और मित्र की मौत मेरे लिए किसी सदमे से कम नहीं है।

आज मुझे लग रहा है कि मेरा एक हिस्सा मुझसे अलग हो गया है.. राजेश की मृत्यु को लेकर जो बातें सामने आ रही है उसकी सच्चाई की पुष्टि नहीं कर सकता हूं लेकिन मैं सरकार से इतनी मांग जरूर करुंगा कि राजेश की आत्महत्या की CBI से जांच होनी चाहिए इससे कम कुछ नहीं.. एक बेहद ईमानदार खुशमिजाज अफसर कम से कम इसका तो हक़दार है। और राजेश .. तुझ से मुझे हमेशा शिकायत रहेगी .. हालात चाहे जैसे भी थे .. हार नहीं माननी चाहिए थी यार।

वर्तिका नंदा, मीडिया विश्लेषक-

तुम चले गए क्‍या राजेश? सच में चले गए क्‍या? मैं कल तुम्‍हीं से मिलने आने वाली थी लखनऊ। सोचा, मिलेंगे क्‍या अब ऐसा कभी नहीं होगा?

इस पूरी दुनिया में किसी को शायद आभास भी न हुआ कि तुम एक बेहद नेकदिल इंसान से भी बहुत बहुत ज्‍यादा थे। आज से ठीक दो बरस पहले मैं दैनिक हिन्दुस्‍तान के एक काम के लिए लखनऊ गई थी। राजेश ने अखबार में मेरा नाम पढ़ लिया। वह आया। हम उस दिन शायद 20 बरस बाद मिले। उसके बाद मैं जब भी लखनऊ गई, राजेश मिला। यह तस्वीर लखनऊ विश्वविद्यलय में ली गई थी। वह यहां सिर्फ इसलिए आया कि उसे मेरा व्याख्यान सुनना था।

राजेश, तुम्‍हारे जैसा कभी कोई नहीं हुआ, न होगा। तुम्हारे साथ बिताए जी टीवी के जे 27 के दिन हम सब हमेशा याद करते रहेंगे। और हमें इस घटना के लिए जिम्मेदार इंसान को सजा दिलानी है। राजेश इस तरह आत्महत्या कर ही नहीं सकते थे। आज मेरे मन का बड़ा हिस्सा मर गया है।


खालिद हामिद, वरिष्ठ पत्रकार-

ये जो विनोद ने लिखा, उसके आगे मैं क्या लिखूं, यही सब तो मेरे दिल मे भी है, आंसुओं के साथ, हम सब जो 1994-95 में जी न्यूज रूम में थे आज हिले हुए है... शाज़ी का फोन आया, वर्तिका रो रही थी, उसे आज लखनऊ में होना था राजेश से मिलने के लिए, कल ही राजेश की बेटी की जॉब तय हुई थी, खुश था... और तीन दिन पहले इसी दोस्त ने मुझे मैसेज किया कि 31 से 7 जून तक मुम्बई आ रहा हूं, तुम हो न वहां, मिलेंगे... हंसकर लिखा... सीरियल में मेरे लिए रोल रखना... ये क्या किया राजेश, रोल ही खत्म कर लिया! विनोद ने लिखा न, वैसे ही मुझे भी कभी भरोसा नही होता था कि इतना नरम दिल इंसान पुलिस में कैसे रहेगा, मैं मजाक भी करता था उस से... तुम गोली कैसे चलाओगे... दोस्त ने जवाब दे दिया, मगर रुलाकर। 

 

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