मीडिया दिग्गज प्रणॉय रॉय के इस ट्वीट पर क्यों छिड़ी है बहस?

Monday, 14 May, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

एनडीटीवी के संस्थापक और चेयरपर्सन प्रणॉय रॉय के एक ट्वीट पर बड़ी तेज़ी से कमेंट आ रहे हैंकुछ लोग उनके समर्थन में हैं और कुछ विरोध में। रॉय ने 12 मई को सुबह 5:34 मिनट पर एक ट्वीट किया थाजिसमें उन्होंने चुनाव आयोग के एक फैसले पर सवाल उठाये हैं।

उन्होंने लिखा है. कि 'मैंने हमेशा चुनाव आयोग का बहुत सम्‍मान किया है। यह हमारे देश की बेहतरीन संस्‍था है। लेकिन, चुनाव आयोग द्वारा आज उठाया गया कदम काफी अप्रत्‍याशित है, जिसमें टीवी चैनलों को किसी राजनेता के साथ इंटरव्‍यू और डिबेट न करने के लिए कहा गया है। यह अतिरेक है। मैं उम्‍मीद करता हूं कि इतनी अधिक दखलअंदाजी का ये ट्रेड लोकतंत्र में जल्दी ही समाप्त होगा।


प्रणॉय रॉय के विचारों से इत्तेफाक न रखने वालों का कहना है कि आयोग के इस कदम की सराहना की जानी चाहिए क्योंकि इससे फ़िज़ूल की बहस से मुक्ति मिलेगी। इस बात में कोई दोराय नहीं कि आजकल न्यूज़ चैनलों पर आने वाले अधिकांश डिबेट शो मच्छीबाज़ार की माफिक हो गए हैं। जहां तार्किक बहस के बजाये एक दूसरे को नीचा दिखाने का खेल चलता है। ऐसी शो में अब सभी मर्यादाएं भी तार-तार होने लगी हैं।

न्यूज़ 18 के डिबेट शो ‘हम तो पूछेंगें’ का है वह एपिसोड कैसे भुलाया जा सकता है जब एंकर सुमित अवस्थी और कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी के बीच धक्कामुक्की तक की नौबत आ गई। इस तरह की तस्वीरें तेज़ी से आम होती जा रही हैंइसलिए आम जनता डिबेट शो में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखाती जितनी किसी ज़माने में दिखाती थी। लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं होना चाहिए कि डिबेट शो पर रोक ही लगा दी जाए।

लोकतंत्र में किसी भी मुद्दे पर बहस करना और जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछना न केवल मीडिया का हक़ है बल्कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह बेहद ज़रूरी भी है। जब अलग-अलग पार्टियों-विचारधाराओं के राजनेता एक मंच पर अपना-अपना पक्ष रखते हैं तो काफी कुछ नया सामने आता है। आरोप-प्रत्यारोप के दौर में कभी कभी ऐसी बातें भी सामने आ जाती हैं जिनका जनता को भान होना चाहिए। नेताओं के बीच डिबेट कराने या उनसे सवाल पूछने से किस तरह का खतरा उत्पन्न हो सकता हैइसका जवाब तो चुनाव आयोग ही दे सकता है।

प्रणॉय रॉय ने बेहद वाजिब बात कही हैइस तरह के फैसले लोकतंत्र की स्वतंत्रता के लिए घातक हैं और इसके खिलाफ सभी स्तर पर आवाज़ उठनी चाहिए। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि नहीं बल्कि जनता सर्वोच्च होती हैलिहाजा उस पर ही यह निर्णय छोड़ देना चाहिए कि उसे नेताओं की डिबेट या उनके इंटरव्यू देखने हैं या नहींयदि जनता ऐसे कार्यक्रमों को नकार देती हैतो चैनलों को खुद ब खुद उन्हें बंद करना पड़ेगाक्योंकि आजकल सबकुछ टीआरपी पर टिका है। जो कार्यक्रम जनता में दिलचस्पी नहीं जगा पाते उनका भविष्य ज्यादा लंबा नहीं होता। चुनाव आयोग या कोई अन्य सरकारी संस्था यदि इस तरह मीडिया को नियंत्रित करने का प्रयास करेगी तो इसके नकारात्मक परिणाम ही सामने आएंगे।     

 

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एबीपी न्यूज पर पुण्य प्रसून बाजपेयी का ‘मास्टरस्ट्रोक’

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