पत्रकार विष्णु शर्मा ने उठाया सवाल- कहां गया बोस का वो खजाना…!

पत्रकार विष्णु शर्मा ने उठाया सवाल- कहां गया बोस का वो खजाना…!

Tuesday, 23 January, 2018

उस बैग के अंदर एक स्टील का केस था और उसके अंदर 14 पैकेट। जिनके अंदर नेताजी की बाकी वस्तुओं के अलावा जले हुए जेवर थेमहिलाओं के कुंडलगले के हारनाक की नथ और हाथों की चूड़ियां-अगूंठियांअधिकारियों को अंदाजा नहीं था कि इसमें जेवर होंगे तो वो काफी चौंके कि बोस के सामान में महिलाओं के जेवर कैसेहालांकि जब जेवरों का वजन सामने आया तो तमाम आजाद हिंद फौज से जुड़े रिसर्चर और पुराने स्वतंत्रता सेनानी चौंके कि बाकी का खजाना कहां गया?’ इंडिया न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लिखे अपने लेख में ये कहा पत्रकार विष्णु शर्मा ने। उनका पूरा लेख आप यहां पढ़ सकते हैं-

अपने आखिरी जन्मदिन पर सोने से तुले थे बोसकहां गया बोस का वो खजाना…!

नेताजी का 48वां जन्मदिन थाआजाह हिंद फौज के अधिकारियों और रंगून के भारतीयों ने बोस के जन्मदिन का पूरा सेलीब्रेशन वीक मनाया। तारीख थी 29 जनवरी, 1945, सेलीब्रेशन वीक का आखिरी दिन थातय किया गया कि देश को आजाद कराने के लिए बोस के वजन के बराबर सोना आजाद हिंद फौज के लिए दिया जाएगा। देश विदेश से भारतीयों खासकर महिलाओं ने अपने अपने जेवर बोस के लिएदेश को आजाद देखने के लिए दान दे दिए थे। 

बोस को सोने से तोला गया, 80 किलो से ज्यादा के थे बोस और उतना ही सोने का जेवर उनको उनके मिशन के लिए उस समारोह में दे दिया गया। उस वक्त उसकी कीमत 2 करोड़ से भी ज्यादा आंकी गई थी। इस घटना का जिक्र कर्नल ह्यूग टोए ने आजाद हिंद फौज पर लिखी अपनी किताब ‘द स्प्रिंग टाइगर’ में किया है।

अक्टूबर 1978 का दिन थादेश आजाद होने के बाद पहली बार कोई गैर कांग्रेसी सरकार देश पर राज कर रही थी। नेहरू के आदेश पर अब तक बोस के प्लेन एक्सीडेंट के बाद जिस डिप्लोमेटिक बैग को हाथ नहीं लगाया गया थामोरारजी देसाई के राज में उसे खोला गया। 

उस बैग के अंदर एक स्टील का केस था और उसके अंदर 14 पैकेट। जिनके अंदर नेताजी की बाकी वस्तुओं के अलावा जले हुए जेवर थेमहिलाओं के कुंडलगले के हारनाक की नथ और हाथों की चूड़ियां-अगूंठियांअधिकारियों को अंदाजा नहीं था कि इसमें जेवर होंगे तो वो काफी चौंके कि बोस के सामान में महिलाओं के जेवर कैसेहालांकि जब जेवरों का वजन सामने आया तो तमाम आजाद हिंद फौज से जुड़े रिसर्चर और पुराने स्वतंत्रता सेनानी चौंके कि बाकी का खजाना कहां गयाक्योंकि 80 किलो से ज्यादा सोना तो उस दिन का थाजिस दिन बोस को सोने से तोला गया था। 

जनवरी 1953 को जब टोक्यो से ये बैग आया था तो नेहरू ने इसको चैक किया थालेकिन इसको सुरक्षित रखवा दिया था क्योंकि ये बोस के प्लेन क्रेश की आखिरी निशानी थी। ना नेहरू ने उस वक्त ये कहीं दर्ज करवाया कि इस डिप्लोमेटिक बैग में क्या क्या था और ना ही अलग अलग जांच आयोगों ने। अधिकारियों ने चार बार कांग्रेस सरकार को बोस के खजाने की लूट पर सवाल उठाते हुए इनक्वायरी कमेटी की मांग कीलेकिन सरकार ने उस पर कोई कमेटी नहीं बनाई। उसी साल तीस दिसंबर को इस बैग को नेशनल म्यूजियम में रखवा दिया गया। 

अब जानिए उन दिनों किस किस ने बोस के खजाने की लूट का संदेह जताते हुए इनक्वायरी की मांग थीजिसे सरकार ने लगातार नजरअंदाज किया। इनमें सबसे पहले थे बेनेगल रामा रावजो दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने टोक्यृं में इंडियन लायजन मिशन के हैड थे, 1947 दिसम्बर में उन्होंने सरकार से इसकी जांच की सिफारिश की। उनके बाद आए मिशन के हैड के के चेत्तूर ने बाकायदा आजाद हिंद फौज के बोस के पुराने सहयोगी राम मूर्ति का नाम लेकर आरोप लगाया।  

1952 में विदेश मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी आरडी साठे ने तो 1952 में राम मूर्ति के साथ साथ अय्यर का भी बोस के खजाने की लूट में हाथ बताया और सरकार से इन्कवायरी कमेटी बनाने की सिफारिश की। फिर भी सरकार ने कान नहीं धरे। दो साल बाद यानी 1955 में टोक्यो में भारत के राजदूत एके डार ने फिर सरकार से लिखित में सिफारिश की कि बोस के खजाने की लूट की जांच के लिए एक जांच आयोग बनाना बहुत जरूरी है। तब भी नेहरू ही प्रधान मंत्री थे। नेहरू ने चारों बार ना कोई इन्क्वायरी कमेटी बनाई और ना ही इन चारों की मांग पर कोई प्रतिक्रिया दी। 

ऐसा नहीं था कि नेहरू आएनए के मामलों में ध्यान नहीं दे रहे थेबल्कि आईएनए से जुड़े सारे मामलों को सीधे उन्हें ही भेजा जाता था। 1952 में जब उनके प्रिंसपल प्राइवेट सेक्रेटरी बीएन कौल ने उनको खत लिखा तो उन्होंने फौरन सेंटर बोर्ड ऑफ रेवेन्यू को वो 28 लाख रुपया लौटाने से इनकार करने का आदेश जारी कियाजो पांच आजाद हिंद फौज के अधिकारियों से जब्त हुआ थाजब वो एक जापानी पनडुब्बी से 1944 में उड़ीसा के तट पर उतरे थे। 

मोरारजी देसाई की सरकार के वक्त सुब्रहामण्यिम स्वामी ने भी उनको खत लिखकर बोस के खजाने की लूट की मांग थी और सीधे सीधे उस लूट में नेहरू का हाथ बताया था। मोरारजी देसाई ने उस वक्त संसद में इस खजाने के लूट के दोषियों को सजा देने काजांच का ऐलान भी किया था। इसी के चलते नेशनल म्यूजियम में रखा वो डिप्लोमेटिक बैग भी खोला गया थाजो जापान से आया था। लेकिन उसके बाद जनता पार्टी की सरकार आपसी फूट का शिकार होकर चारों खाने चित हो गई और इनक्वायरी तक का ऐलान नहीं हुआ। 

अब जानिए उन व्यक्तियों के बारे में जिन पर आजाद हिंद फौज के सिपाहियों ने लूट का आरोप उस वक्त देश के कई अधिकारियों और जांच आयोगों ने ही नहींबोस पर रिसर्च के लिए मशहूर अनुज धर ने भी लगाया। एक थे एस ए अय्यरजो पेशे से कभी पत्रकार थेएपी और रॉयटर्स जैसी एजेंसियों के लिए काम कर चुके थेआजाद हिंद सरकार के सूचना प्रसारण मंत्री और जब नेताजी ने सोवियत रूस के लिए अपनी आखिरी उड़ान भरी तो उस वक्त ये वहां मौजूद थे।  

कहा जाता हैनेताजी ने काफी खजाना उस वक्त इन्ही के पास छोड़ दिया था। कुछ दिनों बाद अय्यर ने ही बोस की मौत की खबर ड्राफ्ट करने में जापान सरकार की मदद की थी। हालांकि अय्यर पर लगे आरोपों को उनका परिवार खारिज करता रहा है। इसी अय्यर को 1953 में नेहरू ने अपनी पहली पंचवर्षीय योजना में एडवाइजर नियुक्त कर दिया था। 

दूसरे थे राममूर्तिआईएन अधिकारीएक जापानी अधिकारी ने दशक भर बाद खुलासा किया था कि 7 सितम्बर 1945 को राममूर्ति और अय्यर को जापानी सरकार ने कई बॉक्स सोंपे थेजिनमें काफी जेवरात थेजो भारत नहीं भेजे गए। राममूर्ति के छोटे भाई की दुल्हन जब शादी में इंडियन ज्वैलरी से लदी फदी आई तो लोगों ने आरोप लगाए। उन लोगों ने एक जापानी सैन्य अधिकारी कर्नल फिग्स से सांठगांठ कर काफी विलासिता से जीवन बितायाबाद में राममूर्ति और उसकी जापानी वीबी पर टैक्स चोरी का आरोप लगाकर जापान सरकार ने भारत डिपोर्ट कर दिया था।  

इसी कर्नल फिग्स ने एयर क्रैश थ्योरी को जापान में जोर शोर से प्रचारित किया था कि बोस की इस एक्सीडेंट में मौत हो गई थी और राममूर्ति और अय्यर ने इस थ्यौरी को समर्थन दिया था। 1957 मे राम मूर्ति के भाई जे मूर्ति ने टोक्यो में भव्य इंडियन रेस्तरां खोलाजिसे आज भी उनका बेटा चला रहा है। इन लोगों से कभी भी किसी भी इन्क्वायरी कमेटी ने पूछताछ नहीं की। 

बोस पर रिसर्च करने वाले मानते हैं कि समय रहते भारत सरकार ने बोस के खजाने की ढंग से जांच की होती तो वो खजाना आज भारत सरकार का होगा और देश के काम आता। जिन जेवरों को भारतीय महिलाओं ने अपने देश के लिए बेहिचक बोस के नाम पर दान दे दिया थाउसी को लालचियों ने लूट लिया। ऐसे में बोस की मौत के रहस्य के साथ ही खजाने का रहस्य भी इतिहास के पन्नों में दफन हो गया। 

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

 

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