FM रेडियो पर न्यूज क्यों सुरक्षा पर खतरा है? पढ़ें, रेडियो इंडस्ट्री के बेबाक बोल...

Tuesday, 18 April, 2017

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

एफएम रेडियो पर सरकार की ओर से न्‍यूज के प्रसारण की अनुमति न दिए जाने को लेकर रेडियो ऑपरेटर्स ने कई सवाल उठाए हैं। रेडियो ऑपरेटर्स का कहना है कि इस मीडियम के साथ आखिर इस तरह का भेदभाव क्‍यों किया जा रहा है और टीवी, प्रिंट अथवा डिजिटल की तरह इसे कंटेंट की आजादी (content freedom) का इस्‍तेमाल क्‍यों नहीं करने दिया जा रहा है।

इस बारे में  हमारी सहयोगी मैगजीन इंपैक्‍ट (IMPACT)  में सिमरन सभरवाल का एक स्टोरी प्रकाशित हुआ है। इस स्टोरी के हिंदी अनुवाद को आप यहां पढ़ सकते हैं।

तीसरे चरण में एफएम स्‍टेशनों की नीलामी के बाद रेडियो सेक्‍टर में आए उछाल के बाद यही महसूस किया जा रहा है कि इसे सिर्फ भौ‍गोलिक विस्‍तार मिला है और इसे रेडियो कंटेंट का जरूरी आधार अभी नहीं मिल पाया है।

प्रसार भारती के चेयरमैन ए सूर्यप्रकाश ने हाल ही में एक बयान जारी किया था कि निजी एफएम रेडियो स्‍टेशनों को न्‍यूज प्रसारण का अधिकार मिलने से सुरक्षा को लेकर खतरा हो सकता है। उनके इस बयान ने इस सेक्‍टर की चिंताए और बढ़ा दी हैं क्‍योंकि यह पहले से ही कंटेंट की कमी से जूझ रहा है। हालांकि सभी रेडियो ऑपरेटर्स ने एक सुर में सरकार के इस रुख की आलोचना की है।

‘रेडियो मिर्ची’ का संचालन करने वाले एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (ENIL) के एमडी और सीईओ प्रशांत पांडेय का कहना है, ‘प्रसार भारती के चेयरमैन के बयान से तो ऐसा लगता है कि संभवत: वे इस बात से चिंतित हैं कि प्राइवेट ब्रॉडकास्‍टर्स सरकारी चैनलों को कड़ी टक्‍कर दे सकते हैं और सरकारी एकाधिकार खत्‍म कर सकते हैं। प्राइवेट ब्रॉडकास्‍टर्स को न्‍यूज प्रसारण की अनुमति मिलनी चाहिए। जहां तक रोक लगाने की बात है तो यह सिर्फ उन प्राइवेट एफएम ब्रॉडकास्‍टर्स पर लगानी चाहिए जो अवैध और अनैतिक हों।’

डिस कंटेंट की ऐज (AGE OF DIS-CONTENT)

एफएम रेडियो स्‍टेशनों के तीसरे चरण की नीलामी का दूसरा बैच हाल ही में पूरा हुआ था। इस नीलामी के तहत 92 शहरों 266 फ्रीक्‍वेंसी में से 48 शहरों में 66 फ्रीक्‍वेंसी की बिक्री हुई थी। इस नीलामी से सरकार को करीब 202 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी।

इस नीलामी से प्राइवेट एफएम का भौगोलिक विस्‍तार तो हो गया लेकिन इसके कंटेंट में अभी तक कोई बदलाव नहीं हुआ है और यह मुख्‍यत: फिल्‍मी गानों तक ही सीमित है। हालांकि कुछ एफएम चैनलों ने रेट्रो या रोमैंटिक रवैया ही अख्तियार किया हुआ है लेकिन ग्‍लोबल स्‍तर पर रेडियो मार्केट से तुलना करें तो भारतीय रेडियो पर कंटेंट की विविधता का अभाव है।

ऐसे में प्राइवेट एफएम बिरादरी लंबे समय से सरकार से मांग कर रही है कि एफएम रेडियो को न्‍यूज के प्रसारण की भी अनुमति दी जाए, लेकिन अभी तक यह मामला अधर में अटका हुआ है और इसे मंजूरी नहीं मिली है। इस बारे में कई मी‍डिया रिपोर्ट में सूर्यप्रकाश के हवाले से कहा गया है कि प्राइवेट एफएम स्‍टेशनों को न्‍यूज के प्रसारण का अधिकार देने से सुरक्षा संबंधी खतरे हो सकते हैं। रिपोर्ट्स में उनके हवाले से कहा गया है कि सरकार प्राइवेट एफएम स्‍टेशनों को न्‍यूज के प्रसारण का अधिकार दे सकती है लेकिन अनुमति देने से पूर्व सुरक्षा संबंधी बातों को भी ध्‍यान में रखना होगा।

सूर्यप्रकाश का कहना है कि यदि हम प्रजातांत्रिक या डेमोक्रेटिक नजरिये से देखें तो प्राइवेट एफएम चैनलों को न्‍यूज प्रसारण का अधिकार देने का मामला बहुत साधारण दिखाई देता है और ऐसा होना भी चाहिए। लेकिन इसमें देश की आंतरिक सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है।

सूर्यप्रकाश का कहना है कि जहां तक प्राइवेट टीवी चैनलों को न्‍यूज और करेंट अफेयर्स प्रोग्राम को अनुमति देने की बात है तो रेडियो का अपना वर्ग है और इसकी पहुंच का दायरा भी अलग है। इसके अलावा इसके साथ कई अन्‍य मुद्दे भी जुड़े हुए हैं।

यह बयान एक बार फिर से एफएम रेडियो प्‍लेयर्स के बीच चर्चा का विषय बन गया है जो सरकार से न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति पाने में जुटे हुए हैं। कई प्राइवेट रेडियो ब्रॉडकास्‍टर्स ने सूर्यप्रकाश के बयान को हास्‍यास्‍पद और रेडियो उद्योग का अनादर करने वाला बताया है। खासकर तक जब प्रसार भारती के तहत आने वाला पब्लिक रेडियो ब्रॉडकास्‍टर ऑल इंडिया रेडियो (AIR) भी न्‍यूज प्रसारित करता है।

मुख्य कंपनी में मजबूत जड़ें (STRONG ROOTS IN THE PARENT COMPANY)

प्राइवेट एफएम चैनलों पर न्‍यूज के प्रसारण पर रोक को अर्थहीन बताया जा रहा है जबकि अधिकांश एफएम चैनलों के पीछे बड़े मीडिया हाउसेज हैं और उन्‍हें प्रिंट और टेलिविजन में न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति मिली हुई है। ‍

इसके अलावा इस तथ्‍य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि आजकल हम लोग डिजिटल युग में रह रहे हैं जहां पर मोबाइल की पहुंच बहुत ज्‍यादा है और टीवी ने भी डीडी फ्रीडिश और फ्रीटूएयर (FTA) चैनलों के कारण ग्रामीण इलाकों में अपनी अच्‍छी पहुंच बना ली है। खासकर न्‍यूज जॉनर (news genre) पर इनकी पकड़ काफी है।

इस बारे में ENIL के प्रशांत पांडेय का कहना है, ‘रेडियो ब्रॉडकास्‍टर्स के लिए लाइसेंस की अन्‍य शर्तें भी इतनी कड़ी हैं जिनती टीवी न्‍यूज ब्रॉडकास्‍टर्स के लिए हैं। उदाहरण के लिए- रेडियो कंपनियों के सभी डायरेक्‍टरों को बोर्ड में शामिल किए जाने से पहले गृह मंत्राल से मंजूरी लेनी होगी। इसके अलावा कंटेंट को लेकर भी सरकार के निर्धारित नियम हैं जिसका प्राइवेट एफएम ब्रॉडकास्‍टर्स पालन करना होता है। इन नियमों के उल्‍लंघन पर पेनाल्‍टी का भी प्रावधान है। सरकार हमेशा यह कहती है कि वह विचारों की अधिकता को प्रोत्‍साहन देती है। यदि ऐसा है तो एफएम ब्रॉडकास्‍टर्स को न्‍यूज के प्रसारण की अनुमति क्‍यों नहीं दी जा रही है।’

माईएफएम (MY FM) के सीईओ हरीश भाटिया भी प्रशांत पांडेय की इस बात से सहमत हैं। भाटिया का कहना है, ‘मेरा हमेशा से यह मानना है कि प्राइवेट एफएम चैनलों को न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति देनी चाहिए खासकर ऐसे चैनलों को जिनकी पैरेंट कंपनी चार-पांच दशक से न्‍यूज बिजनेस में काम कर रही है।’ भाटिया ने यह सवाल भी उठाया कि क्‍या सरकार यह मानती है कि न्‍यूज प्रसारित करने के मामले में भारतीय एफएम प्‍लेयर्स और उनकी पैरेंट मीडिया कंपनियों में संवेदनशीलता की कमी है।

सिर्फ AIR की है न्‍यूज प्रसारण का अधिकार (AIR NEWS, BUT ONLY ALL INDIA RADIO NEWS)

फेज तीन के रेगुलेशन में यह विवादास्‍पद मुद्दा भी शामिल है जिसमें प्राइवेट एफएम ऑपरेटर्स न्‍यूज को प्रसारित तो कर सकते हैं लेकिन यह सिर्फ ऑल इंडिया रेडियो (AIR) पर प्रसारित न्‍यूज होनी चाहिए और इसमें कोई एडिटिंग नहीं होनी चाहिए।

सरकार का इरादा एक फिक्‍स्‍ड टैरिफ पर ऐसे ऑपरेटरों को ऑल इंडिया रेडियो की न्‍यूज प्रसारित करने का ऑफर देना है। यह टैरिफ चैनल की लोकप्रियता और जगह के आधार पर तय होगा और यह सालाना दो लाख रुपये से लेकर 50 लाख रुपये तक हो सकता है। इसके अलावा सरकार ने यह संकेत भी दिए हैं कि जो एफएम प्‍लेयर्स ऑल इंडिया रेडियो की न्‍यूज को प्रसारित कर रहे हैं, उन्‍हें इस अनुभव के आधार पर इस नियम में कुछ छूट दी जा सकती है और इंडिपेंडेंट न्‍यूज बुलेटिन्‍स प्रसारित करने की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि रेडियो ऑपरेटर्स ने सरकार की इस योजना में जरा भी दिलचस्‍पी नहीं दिखाई है।

सरकार के इस तर्क पर और एफएम प्‍लेयर्स की प्रतिक्रिया के बारे में Ernst & Young (EY) की बिजनेस एडवाइजरी सर्विस (मीडिया एंड ऐंटरटेनमेंट) के डायरेक्‍टर नृपेंद्र सिंह का कहना है, ‘हालांकि इस कवायद का उद्देश्‍य सरकार के लिए रेवेन्‍यू जुटाना है लेकिन एफएम प्‍लेयर्स में इस बात को लेकर दिलचस्‍पी नहीं है कि वे ऑल इंडिया रेडियो की न्‍यूज को प्रसारित करें और उसका भुगतान करें।’ नृपेंद्र का कहना है, ‘एफएम प्‍लेयर्स का मानना है कि इससे कंटेंट में एकरूपता आएगी और इसका एक ही समाचार स्रोत होगा। यह खास परिस्थितियों के लिए तो ठीक हैं क्‍योंकि अधिकांश एफएम चैनल बड़े संस्‍थानों का हिस्‍सा हैं जो प्रिंट और टीवी न्‍यूज दे रहे हैं। इन ग्रुप की क्रेडिबिलिटी उनकी इंडिपेंडेंस और कंटेंट की स्वतंत्रता से बंधी हुई है।’

इस बारे में प्रशांत पांडेय का कहना है, ‘यह धारणा उचित नहीं है। यदि हम AIR की न्‍यूज को ही दोबारा से प्रसारित करेंगे तो इससे लोगों के व्‍यूज को जानने में कैसे मदद मिल सकती है। हमें दूसरे न्‍यूज आर्गनाइजेशन से क्‍यों न्‍यूज प्राप्‍त करनी चाहिए। हम में से ज्‍यादतर मानते है कि AIR की न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अच्छी क्वॉलिटी की नहीं है। ऐसे में हम क्‍यों उसे अपने यहां प्रसारित करें। यदि AIR अपने नजरिये (point of view) को सार्वजनिक करना चाहता है तो अपने श्रोताओं की संख्‍या बढ़ाकर वह ऐसा कर सकता है। या फिरअपने न्‍यूज बुलेटिन्‍स में कॉमर्शियल ऐड्स के रूप में हमारे यहां प्रसारित करा सकते हैं लेकिन यह बात ठीक नहीं है कि हम उनके न्‍यूज  बुलेटिन्‍स का प्रसारण करें और इसके लिए आपको भुगतान भी करें। यह बेकार की बात है और AIR को भुगतान करने का मतलब होगा कि हमारे फायदे में कटौती होगी।।’ भाटिया का कहना है, ‘हम खुद अपनी टॉपलाइन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके बावजूद हमें उस टैरिफ के भुगतान के लिए कहा जा रहा है जो हमारे पास पहले से है।’

बड़े मीडिया प्रतिष्‍ठानों का हिस्‍सा होने के नाते अधिकांश एफएम ऑपरेटर्स न्‍यूज तक आसानी से पहुंच जाते हैं क्‍योकि देश भर में इनके रिपोर्टरों का नेटवर्क फैला हुआ है। यदि प्रादेशिक स्‍तर की बात करें तो लगभग हर ब्‍लॉक, पंचायत आदि में ये न्‍यूज जुटाने की क्षमता रखते हैं, जिसके आगे AIR कहीं नहीं ठहरता है। अपने स्तर पर AIR के पास 44 रीजनल न्‍यूज यूनिट्स (RNUs) हैं, जिनसे यह 67 भाषाओं में रोजाना 355 न्‍यूज बुलेटिन्‍स लेकर आता है।

इस बारे में ‘रेड एफएम’ (Red FM) की सीईओ निशा नारायणन का कहना है, ‘देश भर में 270 से ज्‍यादा प्राइवेट एफएम स्‍टेशन संचालित हो रहे हैं और फेज तीन व फेज पांच में इनकी संख्‍या और बढ़ेगी। न्‍यूज का मतलब सूचना होता है और सभी न्‍यूज पॉलिटकिल न्‍यूज नहीं होती है। न्‍यूज का मतलब है कि आपके शहर अथवा गांव-कस्‍बे में क्‍या हो रहा है और ज्‍यादातर श्रोताओं के लिए यही बात मायने रखती है। AIR वास्‍तव में प्राइवेट चैनलों की डिमांड के अनुसार न्‍यूज कंटेंट को पूरा नहीं कर सकता है, क्‍योंकि उसके पास न्‍यूज यूनिट काफी कम हैं।

भाटिया ने इस बारे में सवाल उठाया, ‘इस बारे में तार्किक बहस होनी चाहिए। सरकार को इंडस्‍ट्री के लोगों के साथ बैठकर उनके विचारों को भी जानना चाहिए। यदि आप रिस्‍क की बात करते हैं तो इसमें क्‍या रिस्‍क है? क्‍या रेडियो जॉकी चैनल की स्‍वीकृति के बिना ऐसे ही कुछ बोल देगा। देश में हमारे चैनल काफी जिम्‍मेदार है और इनका स्‍वामित्‍व बहुत ही प्रोफेशनल, प्रतिष्ठित और बड़ी मीडिया कंपनियों के पास है। तब वे ऐसा क्‍यों करेंगे जो उनकी पैरेंट कंपनी की पॉलिसी के खिलाफ हो।’

इस बारे में नारायणन का कहना है, ‘रेडियो के लिए एक निश्चित सेटअप की जरूरत होती है। यदि न्‍यूज ब्रॉडकास्‍टर्स के लिए कड़े नियम बनाए जाते हैं तो किसी भी उल्‍लंघन को आसानी से निपटा जा सकता है लेकिन न्‍यूज प्रसारण का अधिकार न देना बिल्‍कुल भी ठीक नहीं है।’

वर्तमान में,  रेडियो गैर-समाचार वस्तुओं (non-news items) के रूप में वर्गीकृत जानकारी को प्रसारित कर सकती है, इनमें खेलकूद की घटनाएं,  स्थानीय प्रकृति की घटनाओं,  ट्रैफिक,मौसम संबंधी जानकारी, नागरिक सुविधाओं और प्राकृतिक आपदाओं पर घोषणाओं की लाइव टिप्पणियां शामिल हैं।

इस बारे में ‘मातृभूमि’ के सीनियर जनरल मैनेजर (मार्केटिंग) जार्ज सेबस्टियन का कहना है कि कंटेंट के प्रसारण को लेकर रेडियो को वह अनुमति नहीं मिली है जो टीवी, प्रिंट और डि‍जिटल को दी गई है। इसके अलावा, इन एफएम प्‍लेयर्स में से अधिकांश के पास टीवी और प्रिंट न्‍यूज का सहारा है जिससे रेडियो आसानी से अपने कंज्‍यूमर को ज्‍यादा से ज्‍यादा कंटेंट और विकल्‍प उपलब्‍ध करा सकता है। जार्ज एसोसिएशन ऑफ रेडियो ऑपरेटर्स फॉर इंडिया (AROI) की गवर्निंग बॉडी का हिस्‍सा भी हैं। उनका कहना है, ‘हालांकि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय चाहता है कि एफएम को स्‍थानीय स्‍तर पर भी प्रासंगिक होना चाहिए लेकिन हम अभी भी इस पर संगीत ही सुनते हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है कि क्‍योंकि इस मीडियम पर बहुत सारे प्रतिबंध हैं। एफएम की शुरुआत के साथ ही इसके सामने बाधाएं आ गईं और यह लालफीताशाही (red-tapism) का शिकार हो गया और यह स्थिति अब तक बनी हुई है।’

रेडियो की मॉनी‍टरिंग पर एसोसिएशन ऑफ रेडियो ऑपरेटर्स फॉर इंडिया का रवैया (MONITORING RADIO: THE AROI STANCE)

सरकार ने जहां सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए रेडियो पर न्‍यूज को मॉनीटर करने की बात कही है, वहीं Ernst & Young (EY) के नृपेंद्र सिंह का कहना है कि जब 800 से ज्‍यादा टीवी चैनलों, 100,000 से ज्‍यादा रजिस्‍टर्ड पब्लिकेशंस और अनगिनत डिजिटल पोर्टल्‍स पर निगरानी रखी जा रही है तो 300 से ज्‍यादा रेडियो स्‍टेशनों की निगरानी ज्‍यादा मुश्किल नहीं है।

इस मामले को लेकर AROI एक आचार संहिता बनाने के लिए तैयार है, जिसका सभी सदस्‍य कड़ाई से पालन करेंगे। ‘ईस्‍टर्न मीडिया लिमिटेड’ (संवाद ग्रुप) की मैनेजिंग डायरेक्‍टर मोनिका नायर पटनायक का कहना है कि यदि मॉनीटरिंग को लेकर किसी तरह की बात है तो AROI ने सरकार को बताया है कि इसके सदस्‍य एक आचार संहिता तैयार करेंगे और नियम-कानून तय किए जाएंगे कि क्‍या प्रसारित किया जाना है और क्‍या नहीं। हम जिम्‍मेदारी ले रहे हैं और गाइडलाइन बनाने के साथ ही हम यह भी सुनिश्चित करेंगे कि इन गाइडलांस का पालन हो। रेडियो ऑपरेटर्स का भी इस बात पर जोर है कि नियम व शर्तें होनी चाहिए और इनका पालन किया जाएगा।

इसके अलावा एक प्रस्‍ताव यह भी है कि ब्रॉडकास्‍ट किए गए पूरे कंटेंट का ऑपरेटर्स एक निश्‍चित समय तक रिकॉर्ड रखेंगे। लेकिन इससे रेडियो प्‍लेयर्स की कॉस्‍ट बढ़ सकती है। सेबस्टियन का कहना है, ‘सरकार की शर्त है कि आपके पास एक अलग सर्वर होना चाहिए जहां पर प्रोग्रामों का बैकअप रखा जाए ताकि उसकी मॉनीटरिंग की जा सके। सरकार नजर रखना चाहती है और हमें एक सर्वर लगाने के बारे में कहा जा रहा है, जिसकी कॉस्‍ट रेडियो ऑपरेटर्स को चुकानी पडेगी। इसके अलावा हमें सरकार को मॉनी‍टरिंग फीस भी देनी होगी। आखिर क्‍यों हम ऐसा करें। यह एकतरफा बात बिल्‍कुल ठीक नहीं है। इसके अलावा सरकार ने कंटेंट उपलब्‍ध कराने के बारे में अभी कोई बात नहीं कही है।

ऐसे में जब रेडियो ऑपरेटर्स के सामने सुरक्षा संबंधी मुद्दा छाया हुआ है,  नारायणन का कहना है कि इसका समाधान बहुत आसान है। नारायणन का कहना है, ‘यदि सुरक्षा को लेकर मामला है तो उसे संवेदनशील और बॉर्डर क्षेत्रों में न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति नहीं दी जाए। सिर्फ उन्‍ही जगहों पर रेडियो को न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति दी जाए जो संवेदनशील नहीं है। इसे ट्रायल के तौर पर भी शुरू किया जाए लेकिन कम से कम शुरू तो हो। लेकिन सरकार का यह रवैया ठीक नहीं है और रेडियो के साथ हो रहे भेदभाव को रोकना होगा।

 रेवेन्‍यू और प्रोग्रामिंग (REVENUES & NICHE PROGRAMMING)

एफएम पर रेडियो न्‍यूज की अनुमति मिलने पर तमाम तरह का कंटेंट और मूल्‍य अपने कंज्‍यूमर को उपलब्‍ध कराने होंगे। इससे अतिरिक्‍त रेवेन्‍यू भी जुटाया जा सकता है। हालांकि रेडियो ऑपरेटर्स के लिए यह रेवेन्‍यू नहीं है लेकिन इसे गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है। क्‍योंकि अधिकांश लोग न्‍यूज को रेवेन्‍यू जुटाने का साधन नहीं समझते है।

इस बारे में भाटिया का कहना है, ‘जिन लोगों का मानना है कि प्राइवेट एफएम चैनल सिर्फ म्‍यूजिक और ऐंटरटेनमेंट के लिए होते हैं वे रेडियो को और ज्‍यादा गंभीर होते हुए देखेंगे सिर्फ एक बार इसे न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति मिल जाए।’

वहीं, पांडेय का कहना है, ‘इसका उद्देश्‍य रेवेन्‍यू जुटाना नहीं बल्कि अपने श्रोताओं को जानकारी मुहैया करना है और सरकार इस बात को भलीभां‍ति जानती है। जब कहीं पर भी बाढ़ आ जाती है अथवा कहीं पर बम विस्‍फोट की घटना हो जाती है तब सरकार को हमारी क्‍यों याद आती है कि शांति बहाल का संदेश बहाल करने में हम उसकी मदद करें। तब हम अचानक इतने अच्‍च्‍छे लोग कैसे हो जाते हैं?

वहीं, पटनायक का कहना है कि यह मामला कंटेंट में विविधता का ज्‍यादा है क्‍योंकि यह नोटबंदी से जुड़ा हुआ है।

पटनायक का कहना है, ‘यदि हम दिन भर के हाईलाइट्स को प्रसारित करते हैं तो न्‍यूज चैनल के रेवेन्‍यू में बढ़ोतरी हो सकती है। हमें इससे स्‍पॉन्‍सर भी मिल सकते हैं। ऐसे में इसे मंजूरी दिए जाने की तुरंत जरूरत है क्‍योंकि अब इस लाइन में सभी प्‍लेयर सिर्फ म्‍यूजिक स्‍टेशन बनकर रह गए हैं।’ वहीं सिंह ने भी इस बात को दोहराते हुए कहा कि न्‍यूज प्रसारित करने का अधिकार मिलने पर एफएम चैनलों के रेवेन्‍यू में भी बढ़ोतरी होगी। इसका प्रभाव निश्चित से कंटेंट पर भी पड़ेगा और कंज्यूमर को विविधत वाला कंटेंट उपलब्‍ध कराया जा सकता है।

इस बारे में ‘रेडियो सिटी 91.1 एफएम’ के सीईओ अब्राहम थॉमस का कहना है, ‘हम प्रत्‍येक उस कदम का स्‍वागत करने के लिए तैयार हैं, जिससे इंडस्‍ट्री को फायदा होगा। हमारा मानना है इससे नए फॉर्मेट भी विकसित होंगे। इसके द्वारा नए श्रोता और नए ऐडवर्टाइजर्स भी जुड़ेंगे और यह सभी लोगों के लिए फायदेमंद स्थिति होगी। श्रोताओं और ऐडवर्टाइजर्स के बीच मजबूत संबंध स्‍थापित करने के लिए न्‍यूज काफी अच्‍छा अवसर है।’

आखिर में यदि देश में ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों तक रेडियो प्‍लेयर्स की पहुंच बनानी है तो न्‍यूज  और करेंट अफेयर्स के प्रसारण की अनुमति देनी होगी। इससे यह माध्‍यम पूरी तरह बदल जाएगा।

रेडियो की अहमियत को खासकर किसी प्राकृतिक आपदा के समय कम करके नहीं आंका जा सकता है क्‍योंकि यही एक ऐसा मीडियम है जो बिना बिजली के काम करता है। यह आसानी से उपलब्‍ध है और लोगों के लिए महंगा भी नहीं हैं।

हालांकि यह ज्‍यादा नियंत्रित माध्‍यम है और नियमों में ढील देने से रेडियो ऑपरेटर्स के लिए बिजनेस करना आसान हो जाएगा और ज्‍यादा लोग रेडियो का लाभ उठा सकते है। इस प्रकार रेडियो को आम आदमी का मीडियम बनाया जा सकता है।

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