पढ़िए, किन बिंदुओं पर है सरकार और प्रसार भारती के बीच तकरार... पढ़िए, किन बिंदुओं पर है सरकार और प्रसार भारती के बीच तकरार...

पढ़िए, किन बिंदुओं पर है सरकार और प्रसार भारती के बीच तकरार...

Saturday, 24 February, 2018

केंद्र सरकार और प्रसार भारती के बीच स्थित सामान्य नहीं है। दोनों के बीच कदम ताल मिलाकर चलने जैसी कोई स्थित भी नजर नहीं आ रही है। बिजनेस स्टैंडर्ड के संपादकीय में इस स्थित को उजागर किया गया है और बताया गया है कि दोनों के बीच सत्ता संघर्ष जैसा कुछ घटित हो रहा है। वैसे तो प्रसार भारती और उसकी निगरानी में चलने वाले चैनल तकनीकी तौर पर केंद्र सरकार से पूरी तरह स्वतंत्र हैं, लेकिन आम धारणा इसके उलट है। बिजनेस स्टैंडर्ड में छपे संपादकीय को यहां पढ़कर आप दोनों के बीच की स्थित को भांप सकते हैं-  

प्रसार भारती का संकट

सरकारी नियंत्रण वाली प्रसारण संस्था प्रसार भारती इन दिनों संकट के दौर से गुजर रही है। हाल की घटनाएं इस बात की ओर मजबूती से संकेत करती हैं कि प्रसार भारती बोर्ड और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के बीच सत्ता संघर्ष जैसा कुछ घटित हो रहा है। यह सच है कि इस संघर्ष में कोई बराबरी नहीं है। प्रसार भारती और उसकी निगरानी में चलने वाले चैनल तकनीकी तौर पर केंद्र सरकार से पूरी तरह स्वतंत्र हैं। यह बात और है कि इनके बारे में आम धारणा इसके उलट है। बहरहालअतीत में स्वतंत्रता या कम से कम बेहतर स्वायत्तता से जुड़े कदमों का स्वागत भी किया गया। प्रसार भारती अधिनियम के तहत बोर्ड को अधिकार संपन्न बनाना भी ऐसा ही कदम था। बोर्ड ने गत सप्ताह एक चौंकाने वाले और अवज्ञाकारी कदम में दावा किया कि उसने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के उस निर्देश पर आपत्ति व्यक्त की जिसमें उसने उसे दूरदर्शन और आकाशवाणी के अनुबंधित कर्मचारियों को सेवा से मुक्त करने का आदेश दिया था।

जिन अन्य मुद्दों ने विद्रोही बनाया उनमें बोर्ड के एक नए सदस्य की नियुक्ति भी शामिल थी जो कि भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी था। आईएएस अधिकारी को जिस पद के लिए नामित किया गया था वह दरअसल प्रसार भारती के एक कर्मचारी से भरी जानी थी और उसका चयन प्रसार भारती के उपाध्यक्ष के नेतृत्व वाली एक समिति की खोज प्रक्रिया के बाद होना था। बोर्ड की दलील थी कि एक पदस्थ नौकरशाह की नियुक्ति करना प्रसार भारती अधिनियम का खुला उल्लंघन है। मंत्रालय ने यह आदेश भी दिया था कि दूरदर्शन की नि:शुल्क डिश सेवा में दिखने वाले चैनलों की आगे नीलामी नहीं की जानी चाहिए। इस नीलामी से 300 करोड़ रुपये आते हैं। 

बोर्ड का मानना था कि यह नीलामी बंद करने से प्रसार भारती की वित्त व्यवस्था चरमरा जाएगी। सरकार चाहती है कि इन चैनलों को अन्य मंत्रालय को सौंप दिया जाए और वे जरूरत के मुताबिक उन्हें चलाएं। जाहिर है उसका मानना है कि सरकारी चैनलों की मौजूदा तादाद अपर्याप्त है और हर मंत्रालय का एक चैनल होना चाहिए। टकराव का अंतिम बिंदु था मंत्रालय द्वारा दो पत्रकारों को ऐसे वेतन पर नियुक्त करने का प्रस्ताव जो अन्य पत्रकारों के वेतन की तुलना में बहुत ज्यादा था। सरकारी प्रसारक की जरूरत इसलिए होती है ताकि वह खबरों का प्रसारण करे और ऐसी विश्वसनीय जानकारी मुहैया कराए जो देश के तमाम हिस्सों तक पहुंचे। यह स्पष्ट नहीं है कि प्रसार भारती इस भूमिका को निभा पा रहा है अथवा नहीं क्योंकि उसकी भूमिका सत्ता प्रतिष्ठान के हितों की रक्षा करने तक ही सिमट कर रह गई है। 

उदाहरण के लिए उसने पिछले वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार का भाषण तब तक प्रसारित करने से इनकार कर दिया था जब तक कि उसे नए तरीके से तैयार नहीं किया जाता। इन हालात के बीच सरकार को खुद से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि प्रसार भारती को बनाए रखने का क्या तुक हैइसमें आम जनता का फंड खपाने की क्या दलील हैबीते बजट में इसके लिए 2,800 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। ऐसे में प्रसार भारती के अस्तित्व में बने रहने का कोई तुक नहीं है। कम से कम सरकारी प्रचार विभाग के रूप में तो बिल्कुल नहीं।  अगर ऐसा निर्णय लेना कठिन है तो केंद्र सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के लिए दूसरा उचित विकल्प है यह तय करना कि क्या वे वाकई प्रसार भारती के उल्लिखित लक्ष्य में यकीन करते हैं और उसे स्वतंत्र रूप से चलने देना चाहते हैं।

(साभार: बिजनेस स्टैंडर्ड न्यूज पोर्टल)

 

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