चीफ जस्टिस ने इस मामले की मीडिया रिपोर्टिंग रोकने के अनुरोध को ठुकराया...

Saturday, 11 November, 2017

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

न्यायाधीशों के नाम पर कथित तौर पर रिश्वत लिये जाने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में हाई वोल्टेज ड्रामा हुआ। लेकिन इस दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने एक वरिष्ठ वकील के उस अनुरोध को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कोर्टरूम में शुक्रवार को जो कुछ हुआ उसकी मीडिया रिपोर्टिंग करने से रोकने का आदेश देने का अनुरोध किया था।

दरअसल, शुक्रवार को कोर्टरूम में मामले पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सहित अन्य जजों और याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता प्रशांत भूषण के बीच गर्मा-गरम बहस हुई।

चीफ जस्टिस मिश्रा ने मीडिया को मामले की रिपोर्टिंग करने से रोकने के अनुरोध को खारिज करते हुए कहा, 'मेरा विश्वास है, और हम सभी को सामूहिक रूप से मीडिया की स्वतंत्रता और मीडिया की आजादी में विश्वास है, जब तक कि वे अपनी सीमाओं के भीतर हैं।'

दरअसल, रिश्वत लिये जाने से जुड़े मामले की सुनवाई के अंत में बार संघ के एक सदस्य ने मीडिया को मामले की रिपोर्टिंग करने से रोकने का आदेश देने का अनुरोध किया था। उन्होंने दावा किया था कि कोर्टरूम में जो कुछ हुआ इस मामले की रिपोर्टिंग संस्थान की छवि को धूमिल करेगा, जो न्याय का मंदिरहै।

सीजेआई मिश्रा ने मौखिक दलील को स्वीकार करने से मना करते हुए कहा, ‘मेरा वाक, अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता में भरोसा है।सीजेआई मिश्रा ने कहा, ‘पहली नजर में मेरी हमेशा राय रही है कि वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिये। मैं प्रेस को रोकने के लिये कोई भी आदेश नहीं देने जा रहा हूं।

उल्लेखनीय है कि जजों के नाम पर कथित रिश्वतखोरी के मामले की सुनवाई के दौरान शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने 2 जजों की बेंच के उस ऑर्डर को रद्द कर दिया, जिसमें मामले की सुनवाई के लिए बड़ी बेंच बनाने को कहा गया था। साथ ही सोमवार को इस पर होने वाली सुनवाई भी रोक दी।  

बता दें 9 नवंबर को जस्टिस चेलामेश्वर और नजीर ने कथित तौर पर रिश्वत दिए जाने से जुड़े मामले पर सुनवाई के लिये पांच न्यायाधीशों की एक पीठ का गठन किया था। इस मामले में ओडिशा उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति इशरत मसरूर कुद्दुसी एक आरोपी हैं।

फैसले को पलटते हुए शुक्रवार को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने कहा कि चीफ जस्टिस अदालत के मुखिया हैं और मामलों को आवंटित करने का एकमात्र विशेषाधिकार उनके पास है।

इस दौरान चीफ जस्टिस मिश्रा ने सख्त टिप्पणी में कहा, ‘इस आदेश (संविधान पीठ) के खिलाफ दिया गया कोई भी आदेश जरूरी नहीं रहेगा और इसे रद्द समझा जाएगा।

मामले पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सहित अन्य जजों और अधिवक्ता प्रशांत भूषण के बीच गर्मा-गरम बहस शुरू हो गई। भूषण ने अपनी आवाज तेज करते हुए चीफ जस्टिस से मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने को कहा, क्योंकि सीबीआई की एफआईआर में कथित तौर पर उनका भी नाम है। सीजेआई ने बदले में भूषण से प्राथमिकी की सामग्री को पढ़ने को कहा और उन्हें अपना आपा खोने के खिलाफ चेतावनी दी। भूषण के साथ याचिकाकर्ताओं में से एक अधिवक्ता कामिनी जायसवाल भी थीं।

जस्टिस मिश्रा ने कहा, ‘मेरे खिलाफ निराधार आरोप लगाने के बावजूद हम आपको रियायत दे रहे हैं और आप उससे इनकार नहीं कर सकते। आप आपा खो सकते हैं लेकिन हम नहीं।

भूषण ने कथित तौर पर न्यायाधीशों से संबंधित भ्रष्टाचार के मामले की जांच के लिए एसआईटी के गठन की मांग करते हुए कहा कि सीजेआई का नाम इसमें है। भूषण एनजीओ कैंपेन फॉर जूडिशियल एकाउन्टैबिलिटीऔर जायसवाल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। भूषण को न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने भी फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि अगर कोई कहता है कि सीजेआई को इस मामले पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए तो क्या यह कोर्ट की अवमानना नहीं है।

इसके बाद सीजेआई ने कहा, ‘मेरे खिलाफ कौन सी एफआईआर है, यह बकवास है। एफआईआर में मुझे नामजद करने वाला एक भी शब्द नहीं है। हमारे आदेश को पहले पढ़ें, मुझे दुख होता है। आप अब अवमानना के लिए जिम्मेदार हैं।

भूषण ने पीठ को उन्हें अवमानना का नोटिस जारी करने की चुनौती दी और कहा कि उन्हें बोलने की अनुमति दिए बिना इस तरीके से सुनवाई नहीं चल सकती। लेकिन सीजेआई ने कहा कि आप अवमानना के लायक नहीं हैं। इसके बाद प्रशांत भूषण सुनवाई के दौरान न्यायालय से यह आरोप लगाते हुए बाहर निकल गए कि अदालत ने सबको सुना, लेकिन उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी जा रही है। अदालत कक्ष से निकलने के दौरान उनके साथ धक्का-मुक्की भी हुई।


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