कैसे योगी बने सीएम, जानें अंदर की पूरी कहानी यहां...

Thursday, 31 May, 2018

किसी जानकारी या खबर को नहीं जानने से ज्यादा मुश्किल काम होता है, जानकारी के बाद भी उसे सिर्फ अपने तक सीमित रखना और वो भी खुद की जिंदगी के लिए ऐतिहासिक खबर होजाने-माने वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ पर 'यदा यदा हि योगी' किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने बताया कि योगी को पहले ही पता चल गया था कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे।  इस किताब का लोकार्पण 1 जून, शुक्रवार शाम 6 बजे दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में किया जाएगा। किताब का विमोचन केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और विजय गोयल करेंगे। पढ़िए किताब का यह सारांश-

यदा यदा हि योगी

कौन बनेगा मुख्यमंत्री?’ का सवाल उस वक्त भी हवा में तैर रहा था, जब इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर चार्टेड विमान दोपहर में किसी अहम सवारी के आने का इंतजार कर रहा था। यह जहाज सवेरे गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ को दिल्ली लेकर आया था और उसे अगले आदेश का इंतजार करने के लिए कहा गया। किसी जानकारी या खबर को नहीं जानने से ज्यादा मुश्किल काम होता है, जानकारी के बाद भी उसे सिर्फ अपने तक सीमित रखना और वो भी खुद की जिंदगी के लिए ऐतिहासिक खबर हो। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने योगी आदित्यनाथ को लखनऊ पहुंच कर जिम्मेदारी संभालने का आदेश दिया, लेकिन साथ में सलाह भी कि अभी इस खबर को किसी से साझा नहीं करें।

अपने नेता से मुलाकात और आदेश के बाद योगी आदित्यनाथ अपने दिल्ली आवास 19, गुरुद्वारा रकाबगंज रोड पहुंचे, दोपहर को भोजन लेने से पहले सहयोगी को तुरंत लखनऊ चलने की तैयारी के निर्देश दिए।

एयरपोर्ट तक के रास्ते में  दिमाग में बहुत से सवाल चल रहे थे। कुछ सवाल पार्टी को लेकर तो कुछ सवाल नई जिम्मेदारी पर तो कुछ सवाल खुद से भी। एयरपोर्ट पर यूपी बीजेपी के प्रभारी ओमप्रकाश माथुर, अध्यक्ष केशव मौर्य और संगठन सचिव सुनील बंसल अपनी लखनऊ जाने वाली फ्लाइट का इंतजार कर रहे थे जबकि योगी को चार्टेड फ्लाइट से जाना था। योगी ने उन सभी को भी अपने साथ चलने के लिए कहा। चारों एक साथ उसी जहाज में लखनऊ के लिए सवार, तीनों नेताओं को विधायक दल की बैठक के लिए जाना था, लेकिन तब भी पता नहीं कि कौन मुख्यमंत्री होगा, लखनऊ पहुंच गए जहां बीजेपी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा था, ज्यादातर लोग मौर्य के पक्ष में नारे लगा रहे थे- पूरा यूपी डोला था, केशव केशव बोला था और जन जन की आवाज है, केशव के सिर पर ताज है। योगी के स्वागत के लिए पांच-सात कार्यकर्ता थे। वेंकैया नायडू और भूपेन्द्र यादव सवेरे साढ़े दस बजे ही लखनऊ पहुंच गए थे। मैंने सवेरे भूपेन्द्र जी को भी फोन पर खबर जाननी चाही, लेकिन उनके दवाब में हमेशा वाली हंसी, और वही जवाब, भाई साहब हम तो कार्यकर्ता हैं, सच नहीं पता कि किसका नाम है?

लखनऊ के रमाबाई स्थल के मैदान पर धूप चमक रही थी, आसमान साफ था, अगले दिन होने वाले शपथ ग्रहण की तैयारियां तेजी पर थी। स्वतंत्र देव सिंह और विजय बहादुर पाठक समेत कई नेता निर्देश दे रहे थे, लेकिन असली सवाल पर कुहासा गहरा था कि कौन बनेगा मुख्यमंत्री?

एयरपोर्ट पर जब कार्यकर्ताओं का शोर केशव प्रसाद मौर्य का मुख्यमंत्री के तौर पर स्वागत कर रहा था, तब योगी आदित्यनाथ एक तरफ से निकल कर लखनऊ में वीवीआईपी गेस्ट हाउस पहुंच गए, तीनों नेता सीधे पार्टी कार्यालय पहुंच गए। तब तक  वेकैंया नायडू और भूपेन्द्र यादव को दिल्ली से संदेश मिल गया था- विधायक दल की बैठक में योगी को मुख्यमंत्री चुना जाना है। तीनों नेताओं को भी ये संदेश बता दिया गया। तब वे लोग योगी से मिलने गेस्ट हाउस पहुंचें और उसके बाद लोकभवन में विधायक दल की बैठक के लिए रवाना हो गए।

किताब का दूसरा अंश-----

सत्तर के दशक की सुपर हिट फिल्म शोले' का एक सीन याद आता है जिसमें बुजुर्ग ए. के. हंगल कहते हैं, ‘दुनिया में सबसे बड़ा बोझ बाप के कंधे पर बेटे का जनाजा होता है। गोरखपुर के सबसे बड़े अस्पताल बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में अगस्त 2017 में हालात कुछ ऐसे ही थे। एक के बाद एक पिता अपने मासूम बच्चों के बेजान शरीरों के साथ निकल रहे थे, और पीछे-पीछे दौड़ती बदहवास चली आ रही थी उन बच्चों की मांएं। और इतनी बड़ी घटना की वजह सिर्फ एक लापरवाही। अफसरों की लापरवाही, डॉक्टरों की लापरवाही। इसका एक कारण शायद ये भी रहा होगा कि सब समझते हैं कि कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ऑक्सीजन की कमी से एक के बाद एक बच्चे दम तोड़ते गए और उसके बाद भी अफसर लीपापोती करते रहे, नए नए बहाने गढ़ते रहे। उनके कुछ कहने, सफ़ाई देने का कोई मायने नहीं रहा। पचास से ज्यादा बच्चों की जानें चली गईं। इस बहस का भी कोई मतलब नहीं था कि पिछले साल के मुकाबले इस साल कम बच्चों की मौत हुई है। 

गोरखपुर मुख्यमंत्री का इलाका है। वे 19 साल तक यहां से सांसद रहे और जबसे सांसद बने, हर बार जापानी बुखार यानी इनसेफिलाइटिस का मसला संसद में उठाते रहे। कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन गोरखपुर में इनसिफेलाइटिस से मरने का सिलसिला नहीं रूक पाया।

गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में इतने मासूम बच्चों की मौत हुई या हत्या हुईयह कौन तय करेगाये इसलिए शर्मनाक है कि गोरखपुर में हुआ हैजो मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का अपना निर्वाचन-क्षेत्र है। अब तक इस अस्पताल को उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र का सर्वश्रेष्ठ अस्पताल माना जाता है। योगी ने सांसद के तौर पर इसी अस्पताल में जापानी बुखार के इलाज पर जबर्दस्त हंगामा खड़ा किया था। जाहिर है, इस अस्पताल के अधिकारियों को सरकार का डर जरा भी नहीं है। जिस सरकार से अपराधी डरते न हों और जिसकी इज़्जत उसके घर में ही नहीं होवह सरकार भी क्या सरकार हैइस घटना ने योगी सरकार को इतना जबर्दस्त झटका दे दिया है कि वह अपने पूरे कार्यकाल में इससे उबर नहीं पाएगी।’

इस अस्पताल में मरने वाले बच्चे ज्यादातर मध्यम आयवर्ग के या गरीब के बच्चे हैं। रईसों और रसूखवालों के बच्चे सरकारी अस्पतालों में इलाज नहीं कराते,  यदि आप सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारना चाहते हैं तो सांसदोंविधायकोंपार्षदों और सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए यह अनिवार्य कीजिए कि वे खुद का और अपने परिजन का इलाज़ सरकारी अस्पतालों में ही करवाएँ।

कहा जाता है कि जो शासक दोषियों को दण्ड नहीं देताबाद में वही दण्ड भुगतता है। सभी जानते हैं कि योगी का इस पाप से कोई संबंध नहीं है। सभी मानते हैं कि कोई मुख्यमंत्री सरकारी अस्पतालों की ऐसी अमानुष अव्यवस्था का जिम्मेदार नहीं हो सकता। लेकिन उत्तरप्रदेश ही नहींसमूचा राष्ट्र योगी को ‘कुछ करते हुए’ देखना चाह रहा था। देशवासी यह आशा रखे हुए थे कि योगी ऐसी कठोर कार्रवाई करेंगे कि सरकारी अस्पतालों को आरामगाह बनाकर बैठे डॉक्टर व अन्य अमला कांप उठेगा, किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। योगी आदित्यनाथ भी अंतत: एक मुख्यमंत्री ही निकले।अर्थात इतने बड़ेडरावने और कलुषित करने वाले सरकारी पाप को भी वे केवल और केवल बचाते हुए ही दिखे।’

किताब का तीसरा अंश-----------

पर एक युवा सन्यासी भिक्षा लेने के लिए खड़ा था। शरीर पर गेरुआ वस्त्र, घुटा हुआ सिर, दोनों कानों में बड़ेबड़े कुंडल और हाथ में खप्पर।

घर की मालकिन आवाज सुन कर दरवाजे पर आईं तो अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। जहां थी, वहां स्थिर हो गईं, मौन, मुंह खुला तो लेकिन शब्द नहीं फूटे। आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। जो सत्य साक्षात सामने खड़ा था उसे देखते हुए भी यकीन नहीं हो रहा था, या यकीन करने की हिम्मत नहीं थी शायत। लेकिन सत्य सनातन है, टाला नहीं जा सकता। सत्य ही तो था वो, मां के सामने उनका बेटा युवा सन्यासी के भेष में!  

कल तक कॉलेज से लौटकर आते इस हंसते मुस्कुराते चेहरे को देखने की आदत थी, और आज उनका नौजवान बेटा अजय सन्यासी रूप में खड़ा था। मां का मन कहता कि यह मेरा बेटा नहीं हो सकता। लेकिन दिमाग़ जानता था कि ईश्वर जितना कठोर हो सकता है उससे भी कहीं कठोर हृदय हो गया था उनका बेटा। वही बेटा जो अपनी मां को बहुत प्यार तो करता था लेकिन इतना भी नहीं कि कह दे मां को, ये सन्यासी उनका बेटा नहीं है। सत्य का अन्वेषण भावनाओं पर नियंत्रण की अपेक्षा रखता है। ये मार्ग दुरुह है, और इस मां के लाडले बेटे ने यही दुरुह मार्ग पकड़ लेने का निर्णय कर लिया था। उसे अपनी परवाह न रही थी, तो मां को कैसे गले लगाता! मां मन मसोस कर रह गई। भींचकर गले भी न लगा सकी, खुलकर रो भी न सकी। 

बेटे ने स्थिर भाव से कहा, ‘मां भिक्षा दीजिए!

भर्राए हुए गले से मां ने कहा, ‘बेटा ये क्या हाल बना रखा है? घर में ऐसी क्या कमी थी जो तू भीख मांग रहा है?’ 

मां यह मेरा सन्यास धर्म है। योगी की भूख इसी भिक्षा से मिटती है। आप भिक्षा स्वरुप जो भी इस पात्र में देंगी, वही मेरे मनोरथ को पूरा करेगा।

पहले तुम अंदर तो आओ!

युवा सन्यासी मां के आंसुओं से भी नहीं पिघला। बेटा ऐसा कठोर हो जाए तो मां पर क्या बीतती है! लेकिन इतना आसान नहीं समाज की रसधार को छोड़कर सन्यास की झाड़-झंखाड़ वाले कठोर रास्ते पर चलने का फ़ैसला। उससे भी कहीं मुश्किल है अपने बेटे को छोड़ देना, उसके बिना जीना। 

योगी ने कहा, ‘नहीं मां! बिना भिक्षा लिए न तो मैं घर के अंदर आऊंगा और न ही यहां से वापस जाऊंगा। आप पहले मुझे भिक्षा दीजिए! मैं रमता जोगी हूं, आप मुझे भिक्षा दीजिए। फिर मैं प्रस्थान करूँगा।’ 

आंसुओं को छिपाती मां अंदर गई और जो समझ आया, उसने योगी के भिक्षापात्र में डाल दिया। भिक्षा लेते ही योगी आगे चल दिया। आवाज अब भी गूंज रही थी पहाड़ों के करीब पहुँचते बादलों तक। अलख निरंजन! सूरज बादलों में छिपने, पहाड़ के पीछे जाने की कोशिश करता दिखा। वैसे भी उसका उजाला बेमायने हो गया था मां के लिए। 

 

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