केंद्र सरकार ने 23 जून 2016 से ‘पत्रिका’ को डीएवीपी से मिलने वाले विज्ञापनों में भारी कटौती कर दी है, जिसके बाद यह मामला लोकसभा में भी उठा। यह मामला मध्य प्रदेश के रतलाम-झाबुआ क्षेत्र से कांग्रेस सांसद कांतिलाल भूरिया ने शून्यकाल में उठाया। इसी संदर्भ में राजस्थान पत्रिका ग्रुप के एडिटर-इन-चीफ गुलाब कोठारी ने एक हिं
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
केंद्र सरकार ने 23 जून 2016 से ‘पत्रिका’ को डीएवीपी से मिलने वाले विज्ञापनों में भारी कटौती कर दी है, जिसके बाद यह मामला लोकसभा में भी उठा। यह मामला मध्य प्रदेश के रतलाम-झाबुआ क्षेत्र से कांग्रेस सांसद कांतिलाल भूरिया ने शून्यकाल में उठाया। इसी संदर्भ में राजस्थान पत्रिका ग्रुप के एडिटर-इन-चीफ गुलाब कोठारी ने एक हिंदी न्यूज पोर्टल पत्रिका (patrika.com) में एक आलेख लिखा, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं:
यहां पढ़ें: लोकसभा में उठा एक बड़े अखबार में सरकारी विज्ञापन के रोक का मामला
ये भी इमरजेंसी
मंगलवार को लोकसभा में मध्यप्रदेश से कांग्रेस सांसद कांतिलाल भूरिया ने केन्द्र सरकार सहित कई राज्य सरकारों द्वारा राजस्थान पत्रिका समूह के सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगाने का मामला उठाने की आज्ञा मांगी। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने स्वीकृति नहीं दी। आसन की स्वीकृति नहीं मिलने पर कागज सदन के पटल पर रख दिया गया। भूरिया का कहना था कि मीडिया पर अंकुश लगाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। मामला टेबल पर रखे जाने के बाद सरकार को बताना चाहिए कि राजस्थान पत्रिका समूह ने ऐसा क्या किया कि यह नौबत आई। सरकारों ने कब-कब पत्रिका को चेतावनी पत्र लिखे, क्या-क्या कारण दिए तथा कब (सूचना-प्रसारण विभाग) विज्ञापन बंद करने के नोटिस जारी किए। पत्रिका द्वारा जारी पत्रावली भी सदन के बीच आनी चाहिए। इन सबके बिना तो दोनों-तीनों सरकारों को मानना पड़ेगा कि लोकतंत्र में उनका विश्वास ही नहीं है।
पिछले आम चुनावों में सबको विश्वास हो गया था कि 'अच्छे दिन' आने वाले हैं। सरकारें बन जाने के बाद सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह और वसुंधरा राजे के विरुद्ध चले घटनाक्रम से वातावरण ऐसा गहराया कि मानो वे तुरंत जाने वाले हैं। राजनीति में सबके पांव कमजोर होते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इनसे कुछ न कुछ समझौते तो कर लिए, किंतु लगता है इनके सिर पर तलवार भी लटका दी। आज हमारी मुख्यमंत्री को यह तो स्पष्ट है कि भाजपा उनको फिर से मुख्यमंत्री नहीं बनाएगी। अत: वे खुद तो सात पीढ़यों की चिंता में व्यस्त हैं। हर भ्रष्ट अधिकारी को बचाती जा रही हैं। पिछले ढाई वर्षों में राज्य में बड़े-बड़े राष्ट्रीय स्तर और व्यक्तिगत स्तर के दलाल पैदा हो गए। उनमें से कई जेल तक पहुंच गए। सरकार उनके साथ व्यस्त होकर जनता को भूल गई। उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के आदेश मानो मनोरंजन का विषय बनकर रह गए। राज्य की ही भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियां रोज जिस तरह की धरपकड़ कर रही हैं, उससे लगता है कि जैसे यहां लूट-खसोट और बंदरबाट के अलावा कुछ हो ही नहीं रहा।
पत्रिका जब ऐसे समाचार प्रकाशित करता है तो सरकार के अहंकार को ठेस लगती है। समाचार मनगढ़ंत नहीं होता, ब्लैकमेल कभी किया ही नहीं जाता। बस, सरकार के विरुद्ध क्यों छपा? मानो राजाओं का राज लौट आया हो। मीडिया की स्वतंत्रता एवं अभिव्यक्ति का अधिकार राजस्थान पत्रिका के लिए आज उपलब्ध नहीं है। हां, सरकार अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने के लिए स्वतंत्र है। एक मात्र राह का रोड़ा है राजस्थान पत्रिका जो सारे कारनामों को जनता तक पहुंचा देता है। उसका मुंह बंद करना तो अनिवार्य हो गया था। सत्ता में इसका एक ही उपाय होता है- विज्ञापन बंद कर दो। मानो अगले का भाग्य बदल जाएगा। अब तो यह चर्चा भी चल पड़ी है कि आजादी के बाद इतनी भ्रष्ट सरकार प्रदेश में नहीं आई। आज पूरा राजस्थान त्राहि-त्राहि कर रहा है। चाहे बोले कोई नहीं पर भाजपा के मंत्री, सांसद, विधायक सब दु:खी हैं। क्योंकि पिछले ढाई साल में कोई भी योजना नीचे तक नहीं पहुंची है। सब अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर आशंकित हैं। स्वयं मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र रो रहा है किन्तु इनकी गतिविधियों पर किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ा। न दिल्ली कुछ रोक रहा है। न पत्रिका को ही खरीद पाए। न पत्रिका ने कुछ मांगा ही। यह तो पद का अहंकार ही है। जिनसे हर संकट में मदद मांगी जाती थी, स्वार्थवश उन पर ही गोलियां चलाई जा रही हैं।
पत्रिका अपना कार्य अपने सिद्धान्तों से करता आ रहा है। आगे भी जनहित में करता रहेगा। कहीं कोई दाग धब्बा नहीं। यह बात सरकार के अहंकार को मंजूर नहीं। उन्हें तो हर मीडिया अपने अंगूठे के नीचे चाहिए। दिल्ली में भी भाजपा की ही सरकार है। इनकी बिरादरी के लोग ही बैठे हैं। एक फोन से डीएवीपी के केन्द्रीय सरकार के विज्ञापनों पर भी रोक लगा दी। पाठकों को याद होगा कि इमरजेंसी में भी पत्रिका को कांग्रेस विरोधी मानकर तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल फोन पर धमकियां देते रहते थे। कलेक्टर कार्यालय ने सेन्सरशिप बनाए रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, किन्तु तब भी हमारे सरकारी विज्ञापन बंद नहीं हुए थे। आश्चर्य है कि बिना किसी सूचना के आज 'अच्छे दिनों' में भी बंद हैं। क्या यह इमर्जेंसी से भी बड़ा तानाशाही का संकेत नहीं हैं? हमारी मुख्यमंत्री तो बराबर कहती हैं कि वे तो अपनी दिवंगत माता विजयराजे सिंधिया के पदचिन्हों पर चलती हैं। वे भी स्वर्ग से देख रहीं होंगी कि किस-किस के दबाव में सीएम क्या-क्या गलत निर्णय कर रही हैं।
आज भाजपा में मुख्य चर्चा यह है कि, मुख्यमंत्री का पुत्र मोह भयंकर रूप से जाग्रत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुष्यंत सिंह को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में लेने से मना कर दिया था। अब मुख्यमंत्री उसे राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाने के सपने देख रही हैं। पहले यह तो उनको समझ लेना चाहिए कि वह अपने क्षेत्र में जीत भी पाएंगे या नहीं। आज तो भाजपा के साथ सहयोगी वातावरण भी नहीं है। सरकार ऐसे ही चली तो भाजपा निपट भी सकती है। जनता केवल उनके पुत्र पर मेहरबान होगी यह विचारणीय प्रश्र है।
विभिन्न भाजपा सरकारों ने हमारे समाचारों से नाराज होकर क्रमबद्ध तरीके से, मानो योजनाबद्ध ढंग से, विज्ञापन बंद किए। सबसे पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने पत्रिका पर हमला बोला। इस बीच मध्य प्रदेश में हमारे 'अच्छे दिन' आए। बाद में विज्ञापन तो चालू हो गए फाइलें नहीं चली आगे। राजस्थान तो एकदम आक्रामक ही दिखाई दिया। करीब आठ माह हो गए, उसे राजस्थान पत्रिका के विज्ञापन बंद किए हुए। मुंबई की एक विज्ञापन एजेंसी ने तो बताया कि स्वयं मुख्यमंत्री कार्यालय ने हमको विज्ञापन जारी करने से मना किया है। दिल्ली में इन्हीं के सांसद राज्यवर्धन सिंह, सूचना एवं प्रसारण विभाग में राज्य मंत्री हैं। क्या नहीं कराया जा सकता? अब यह तो उम्मीद नहीं कि इस सरकार के रहते अच्छे दिन आएंगे। हम तो हमेशा की तरह अपने पाठकों के बूते अपना कुछ सामान बेचकर भी अगले ढाई साल गुजार लेंगे, किंतु क्या इसी वातावरण के रहते भाजपा सत्ता तक पहुंच पाएगी अगले चुनावों में? और तब क्या दुष्यंत ही नए मुख्यमंत्री होंगे? पुत्र मोह में धृतराष्ट्र बनने से अच्छा है मुख्यमंत्री समय रहते अहंकार छोड़कर जनता की सुध लेना शुरू करें। शायद ईश्वर आपकी सुन ले!
(साभार: patrika.com) समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।26 साल से ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) ने भारत को एक बात बताई है- ज्ञान ही दौलत है। लेकिन इस साल 10 अगस्त को सीजन-18 के साथ KBC हमें कुछ अलग बता रहा है- सिर्फ ज्ञान काफी नहीं है।
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Samachar4media Bureau
डॉ. संदीप गोयल, फाउंडर व चेयरमैन, Mogae Group ।।
26 साल से ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) ने भारत को एक बात बताई है- ज्ञान ही दौलत है। लेकिन इस साल 10 अगस्त को सीजन-18 के साथ KBC हमें कुछ अलग बता रहा है- सिर्फ ज्ञान काफी नहीं है। ऊपर से देखने पर नई थीम लाइन ‘सोचना पड़ेगा’ एक और प्रमोशनल लाइन जैसी लगती है। लेकिन ऐसा नहीं है। अमिताभ बच्चन ने साल 2000 में पहली बार “लॉक किया जाए” कहा था, उसके बाद KBC में यह सबसे बड़ा बदलाव है।
यह सिर्फ कोई विज्ञापन संदेश नहीं है। यह प्रोडक्ट की री-पोजिशनिंग है।
सोनी ने आखिरकार एक कड़वी लेकिन अहम बात स्वीकार की है। अब सिर्फ ज्ञान रखने वाले व्यक्ति को नहीं, बल्कि मुश्किल समय में सही तरीके से सोचने और फैसला लेने वाले व्यक्ति को भी गेम में आगे बढ़ना चाहिए।
अमिताभ बच्चन के साथ बनाए गए तीन नए प्रोमो को देखें। पहले प्रोमो में वह कहते हैं:
“आजकल जवाब जो है ना, वो हर जगह मिलने लगा गया है, आपके जेब में भी। मतलब आपके फोन पे। इसलिए इस बार KBC में जवाब याद रखने से काम नहीं चलेगा।”
सोनी ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि शो को ऐसे दौर के लिए दोबारा तैयार किया जा रहा है, जहां जानकारी बहुत ज्यादा उपलब्ध है, लेकिन उस जानकारी को सही तरीके से इस्तेमाल करने की क्षमता असली अंतर पैदा करती है।
साल 2000 में अगर आपको पेरू की राजधानी पता थी तो आप 1 करोड़ रुपये जीत सकते थे। लेकिन 2026 में मेरी 12 साल की भांजी ChatGPT से 0.4 सेकंड में इसका जवाब हासिल कर सकती है। अगर KBC सिर्फ याददाश्त का टेस्ट बना रहा तो वह हर जेब में मौजूद हर फोन से हार जाएगा।
इसलिए KBC वही कर रहा है जो आज AI के दौर में हर ब्रैंड को करना चाहिए- Knowledge से Applied Knowledge की तरफ बढ़ना।
सोनी ने भी कहा है, “KBC has become a cultural phenomenon... This season, with 'सोचना पड़ेगा', the conversation evolves to celebrate the power of applied knowledge and decision making.” यानी KBC अब Attention Marketing यानी “इस तथ्य को याद रखो” से Intention Marketing यानी “इस तथ्य का इस्तेमाल करो” की तरफ बढ़ रहा है।
यह KBC के लिए सिर्फ नई टैगलाइन नहीं है। गेम के काम करने के तरीके में भी बदलाव किया गया है।
पहले सवाल होते थे- “Discovery of India किसने लिखी?” अब सवाल इस तरह तैयार किए जा रहे हैं कि कंटेस्टेंट को अपनी जानकारी के साथ-साथ सिद्धांतों को लागू करने और क्रिटिकल थिंकिंग यानी तार्किक तरीके से सोचने की जरूरत पड़े।
फॉर्मेट अब सिर्फ याददाश्त और रटकर याद करने की क्षमता का टेस्ट नहीं रहेगा, बल्कि इसमें क्रिटिकल थिंकिंग को भी परखा जाएगा।
उदाहरण के लिए सवाल ऐसा हो सकता है:
“अगर Discovery of India आज लिखी जाती और सिर्फ क्विक-कॉमर्स के जरिए बेची जाती, तो इसकी सबसे अच्छी लॉन्च स्ट्रैटेजी क्या होती?” यानी सिर्फ यह जानना काफी नहीं होगा कि किताब किसने लिखी। अब यह भी सोचना होगा कि आप उस जानकारी का इस्तेमाल कैसे करेंगे।
यह बड़ा बदलाव है। ‘Fastest Finger’ शब्द को अब नाम से हटा दिया गया है। अब कंटेस्टेंट्स को चार विकल्पों को सही क्रम में लगाने की बजाय चार राउंड खेलने होंगे, जिसके जरिए वे Hot Seat तक पहुंचेंगे।
17 सीजन तक Hot Seat पर पहुंचने का रास्ता स्पीड पर निर्भर था। जो सबसे तेज था, वही ‘Fastest Finger’ जीतता था। इससे एक तरह की ट्यूशन और रटने वाली संस्कृति को बढ़ावा मिलता था- रट्टा मारो।
अब Hot Seat तक पहुंचने के लिए चार राउंड होंगे। इसका मतलब है कि रणनीति, निरंतरता और निर्णय लेने की क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण होगी। अब यह सिर्फ एक तेज रेस नहीं है। यह एक तरह की क्वालिफायर लीग है। और यह जिंदगी से भी ज्यादा मेल खाती है।
हाल के गोल्फ-कोर्स प्रोमो में अमिताभ बच्चन कहते हैं: “बचपन में हमें सिखाया गया था कि जो पहले जवाब दे, सबसे सही वही है। लेकिन जिंदगी में कई बार, पहला जवाब ही सही नहीं होता। तो इस बार KBC में, जवाब देने से पहले खुद को जरा रोकना पड़ेगा।”
क्या यह भारत की परीक्षा प्रणाली पर सीधा हमला है? हो सकता है।
हां। तीन वजहों से। पहली वजह यह है कि 26 साल बाद KBC उस एक चीज को बदल रहा है, जिसे उसने कभी नहीं बदला था- ‘Smart’ यानी होशियार होने की परिभाषा। 26 साल तक Smart का मतलब था G.K., यानी General Knowledge। अब Smart का मतलब Presence of Mind यानी मौके पर सही सोच और समझ है।
दूसरी वजह यह है कि इससे यह भी बदल सकता है कि आखिर कौन जीत सकता है। पहले Kota का 19 साल का कोई ऐसा क्विजर, जिसने 10 हजार तथ्य रट रखे हों, जीत सकता था। अब 45 साल का कोई किसान, जिसने अपनी जिंदगी में अपने ज्ञान का इस्तेमाल किया है, उसके पास भी बराबर का मौका हो सकता है। इससे कंटेस्टेंट का आधार ‘Students’ से बढ़कर ‘Thinkers’ तक हो जाता है।
तीसरी और शायद सबसे महत्वपूर्ण वजह है कि इससे शो के अप्रासंगिक होने का खतरा कम हो सकता है। Season 17 में Hot Seat पर आने वाले कंटेस्टेंट की औसत उम्र 34 साल थी। दर्शकों की उम्र भी बढ़ रही है। ऐसे Gen Z दर्शकों को जोड़ने के लिए, जो Google के साथ बड़े हुए हैं, आपको वही चीज टेस्ट करनी होगी जो Google नहीं कर सकता- सोचने की क्षमता।
कम समय में देखें तो यह जोखिम भरा है। लंबे समय के लिए देखें तो यह जरूरी है।
जोखिम क्या है?
KBC की खूबसूरती उसकी सरलता थी। घर पर बैठा कोई भी दर्शक सवाल का जवाब चिल्लाकर दे सकता था। अगर सवाल ज्यादा Analytical यानी विश्लेषणात्मक पहेली जैसे हो गए तो क्या इंदौर में बैठी आंटी अब भी साथ-साथ खेलेंगी?
अगर Fastest Finger की जगह चार राउंड आ गए तो क्या शुरुआती 10 मिनट का रोमांच कम हो जाएगा? ये सवाल महत्वपूर्ण हैं। लेकिन फायदा भी बड़ा है सही दर्शकों के लिए यह शो को और ज्यादा engaging बना सकता है।
विश्लेषणात्मक सवाल घर पर चर्चा पैदा करेंगे। अब चर्चा सिर्फ “जवाब क्या है?” तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भी हो सकती है- “क्या उसे जोखिम लेना चाहिए था?” यही वह चीज है जो IPL को भी दर्शकों के लिए ज्यादा engaging बनाती है।
“सोचना पड़ेगा” सोनी Liv, Fintech Sponsors और Ed-tech Sponsors के लिए एकदम सही लाइन है। यह KBC को सिर्फ एक गेम शो की तरह नहीं, बल्कि Life-skills Show के रूप में पेश करती है।
समय के साथ अमिताभ बच्चन शो की भावनात्मक भाषा का हिस्सा बन चुके हैं। कंटेस्टेंट सवालों के जवाब देने की तैयारी करके आते हैं, लेकिन कुछ ही मिनटों में वे अपने सपनों और संघर्षों के बारे में बात करने लगते हैं। जब गेम में टेक्स्टबुक के ज्ञान से ज्यादा जीवन के अनुभव को महत्व मिलेगा तो अमिताभ बच्चन की एक संवेदनशील श्रोता के तौर पर भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी।
‘सोचना पड़ेगा’ मार्केटर्स को असल में क्या संकेत देता है? KBC वही कर रहा है जो आज हर भारतीय ब्रैंड को करना चाहिए। Memory को पुरस्कृत करना बंद करें। Mindset को पुरस्कृत करना शुरू करें।
20 साल तक हमने जिंगल के जरिए चीजें बेचीं। अब हमें Logic के जरिए बेचना होगा। 20 साल तक हमने डिग्री देखकर लोगों को नौकरी दी। अब हमें Decision-making यानी फैसला लेने की क्षमता देखकर लोगों को चुनना होगा। 20 साल तक हमने Toppers का जश्न मनाया। अब हमें Thinkers का जश्न मनाना होगा।
KBC की नई लाइन सिर्फ किसी क्विज शो के बारे में नहीं है। यह भारत के बारे में है। ऐसे दौर में जब जवाब हर जगह मौजूद हैं, Hot Seat पर या जिंदगी में वही लोग जीतेंगे, जो जवाब लॉक करने से पहले थोड़ा रुककर सोचेंगे। और यही वजह है कि ‘सोचना पड़ेगा’ सिर्फ एक विज्ञापन लाइन नहीं है। यह एक चेतावनी, पोजिशनिंग और सर्वाइवल स्ट्रैटेजी है- सिर्फ दो शब्दों में। बहुत बढ़िया काम, गौरव बनर्जी और सोनी की पूरी टीम।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
Disclaimer: इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह लेखक के अपने हैं और किसी भी तरह से exchange4media.com के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि केवल आरोप लगने से किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकने की व्यवस्था नहीं है। मौजूदा कानून में मुख्यतः दोषसिद्धि के बाद अयोग्यता होती है।
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Samachar4media Bureau
आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार, पद्मश्री, लेखक।
अब इस बात के पूरे आसार दिख रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार संसद में महिलाओं के 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व और सदस्य संख्या लगभग 816 से अधिक रखने के संवैधानिक प्रावधान वाले विधेयक आने वाले किसी भी सत्र में पारित करवा लेंगे। कांग्रेस और उसके सहयोगियों के विरोध के बावजूद क्षेत्रीय दलों के सांसदों का समर्थन मिलना तय है।
लेकिन क्या इससे अधिकाधिक योग्य, समाज से जुड़ी, ईमानदार महिलाएं और स्वच्छ छवि तथा गंभीर आपराधिक आरोपों से मुक्त सदस्य चुनावों के बल पर संसद में आ सकेंगे? इस तरह का एक सवाल राजनीति में सक्रिय एक सुसंस्कृत परिवार की शिक्षित प्रवक्ता ने पिछले दिनों एक अनौपचारिक बातचीत के दौरान मुझसे किया। सचमुच तत्काल इसका उत्तर मेरे पास नहीं है। इसलिए मैंने इस बार अपने कॉलम में इस मुद्दे से जुड़ी बातें रखना उचित समझा।
यदि संसद लोकसभा की सीटों का परिसीमन करके संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करती है और महिलाओं के लिए लगभग 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करती है, तो भारतीय लोकतंत्र की चुनावी तस्वीर काफी बदल जाएगी। 816 सीटों के मॉडल में लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसका मतलब है कि नई लोकसभा में कम-से-कम 273 महिलाएं आरक्षित सीटों के माध्यम से पहुंचेंगी। नई व्यवस्था में लोकसभा का बहुमत भी बदल जाएगा। 543 सदस्यीय वर्तमान लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 272 है, जबकि 816 सदस्य होने पर बहुमत के लिए 409 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा।
परिसीमन का दूसरा बड़ा असर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आरक्षित सीटों पर पड़ेगा। अभी लोकसभा में 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। नई जनसंख्या-आधारित परिसीमन व्यवस्था में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सीटें लगभग 126 से 136 और करीब 70 तक पहुंचने का अनुमान है। अंतिम संख्या परिसीमन आयोग ही तय करेगा।
महिला आरक्षण का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आरक्षित सीटों में भी लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। करीब 45 और करीब 23 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं। इस प्रकार 273 महिला आरक्षित सीटों में अनुसूचित जाति-जनजाति महिलाओं का भी संवैधानिक प्रतिनिधित्व रहेगा।
परिसीमन का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रभाव राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण पर पड़ेगा। आबादी के आधार पर सीटें बढ़ने से उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे बड़े और अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। उदाहरण के तौर पर प्रस्तावित मॉडल में उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर लगभग 120 और बिहार की 40 से लगभग 60 हो सकती हैं।
महाराष्ट्र लगभग 72, पश्चिम बंगाल 63, तमिलनाडु 59, मध्य प्रदेश लगभग 44 और कर्नाटक लगभग 42 सीटों तक जा सकते हैं। ये अभी संभावित आंकड़े हैं, अंतिम परिसीमन में बदलाव संभव है। वास्तविक संख्या अंतिम रूप से सरकार द्वारा रखे गए प्रस्ताव और परिसीमन आयोग की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही तय होगी।
दक्षिण भारत की चिंता भी महत्वपूर्ण है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है। उनका तर्क है कि यदि केवल वर्तमान आबादी को आधार बनाकर सीटें बांटी गईं तो जिन राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित की, उनका लोकसभा में सापेक्ष राजनीतिक वजन घट सकता है। दूसरी ओर 816 सीटों का प्रस्तावित मॉडल इस नुकसान को कम करने के लिए कुल सीटों को ही काफी बढ़ाने का रास्ता अपनाता है।
इसलिए 816 सीटों का मॉडल केवल महिला आरक्षण का मामला नहीं, बल्कि भारत के संघीय राजनीतिक संतुलन का भी बड़ा प्रश्न है। एक तरफ उत्तर भारत के बड़े राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, दूसरी तरफ दक्षिणी राज्यों को भी मौजूदा सीटों की तुलना में अधिक सीटें मिलेंगी। अंतिम संख्या संसद के कानून और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया से तय होगी।
इसी तरह चुनाव लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन चुनावी राजनीति के सामने दो गंभीर चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं—राजनीति का अपराधीकरण और चुनाव में बढ़ता धनबल। पिछले कई दशकों में निर्वाचन आयोग, सुप्रीम कोर्ट, विधि आयोग और विभिन्न सरकारी समितियों ने इन समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए अनेक सुझाव दिए हैं। कुछ सुझाव कानून बने, कुछ पर न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसले दिए और कई आज भी संसद तथा सरकार के सामने लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी महीने एक फैसले में कुछ महत्वपूर्ण अनिवार्य कही जा सकने वाली सिफारिशें भी की हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि केवल आरोप लगने से किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकने की व्यवस्था नहीं है। मौजूदा कानून में मुख्यतः दोषसिद्धि के बाद अयोग्यता होती है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड को मतदाताओं के सामने अनिवार्य रूप से रखने की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। निर्वाचन आयोग ने भी गंभीर आपराधिक मामलों में आरोप तय हो चुके उम्मीदवारों को चुनाव से बाहर रखने का प्रस्ताव दिया है। लेकिन इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए संसद को कानून बनाना होगा।
2013 में सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण कदम उठाया था। इसके बाद किसी सांसद या विधायक को ऐसे अपराध में दोषी ठहराया जाता है जिसमें कानून के अनुसार दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होती है, तो दोषसिद्धि के प्रभाव से सदस्यता समाप्त हो सकती है। निर्वाचन आयोग ने भी इसे राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण सुधार माना गया।
लेकिन यहां एक बड़ी सीमा है—दोषसिद्धि होने तक मुकदमा चलता रहता है। यदि मामला वर्षों तक लंबित रहे तो केवल आरोप या आरोपपत्र के आधार पर उम्मीदवार स्वतः अयोग्य नहीं होता। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और प्रावधान किया। न्यायालय ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे ऐसे उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि सार्वजनिक करें जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं।
केवल रिकॉर्ड प्रकाशित करना ही पर्याप्त नहीं माना गया; राजनीतिक दल को यह भी बताना होगा कि उसने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को टिकट क्यों दिया और किसी साफ-सुथरे उम्मीदवार को क्यों नहीं चुना।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस चरण पर भी चुनाव लड़ने पर स्वतः प्रतिबंध नहीं लगाया। 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के निर्देशों को और मजबूत किया। राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चयन के 48 घंटे के भीतर, अथवा नामांकन की पहली तारीख से कम-से-कम दो सप्ताह पहले, आपराधिक मामलों की जानकारी और उम्मीदवार को चुनने का कारण प्रकाशित करने का निर्देश दिया गया।
अभी निर्वाचन आयोग का यह प्रस्ताव विचाराधीन है कि किसी उम्मीदवार के खिलाफ ऐसे गंभीर अपराध में अदालत द्वारा चार्ज फ्रेम किए जा चुके हों, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, तो उसे चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की व्यवस्था हो।
इसलिए भविष्य का चुनाव सुधार तीन सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए—न्यायिक निष्पक्षता, मतदाता की पूर्ण जानकारी और गंभीर अपराधों के प्रति शून्य राजनीतिक सहनशीलता। धनबल के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए। चुनावी चंदे और खर्च की पूर्ण पारदर्शिता, पार्टी और उम्मीदवार दोनों के खर्च की निगरानी, डिजिटल वित्तीय रिकॉर्ड और सीमित रूप में सरकार द्वारा चुनाव प्रचार अभियान की वित्तीय व्यवस्था मिलकर चुनाव को अधिक समान बना सकते हैं।
इस महीने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय में कहा गया है कि चुनावों की आवर्ती प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, उच्च न्यायालय उम्मीदवारों, मौजूदा सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की शीघ्र सुनवाई और निपटान के लिए न्यायालयों को नामित कर सकते हैं।
किसी विशेष चुनाव चक्र में उम्मीदवारों के खिलाफ मुकदमों की वापसी के लिए संबंधित उच्च न्यायालय की मंजूरी आवश्यक है, जो केरल राज्य बनाम के. अजित और अश्विनी कुमार उपाध्याय मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप है। संबंधित न्यायालयों को चुनाव संबंधी लंबित मुकदमों को शीघ्रता से उनके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। निर्वाचन आयोग और संबंधित राज्य सरकारों को 18 नवंबर 2026 को या उससे पहले अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया।
अंततः चुनाव सुधार का उद्देश्य केवल अपराधियों को रोकना या खर्च कम करना नहीं है। उद्देश्य यह होना चाहिए कि भारत की संसद और विधानसभाएं ऐसे प्रतिनिधियों से बनी हों, जिनकी राजनीतिक शक्ति का आधार जनता का विश्वास हो-अपराध, भय और बेहिसाब पैसा नहीं। निर्वाचन आयोग ने अनेक बार सुधारों का रास्ता दिखाया है और सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक सीमाओं के भीतर महत्वपूर्ण रास्ते खोले हैं। अगला निर्णायक कदम संसद और राजनीतिक दलों को उठाना होगा।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
सारी तकनीकी क्रांति के बाद भी मुख्यधारा के मीडिया का वजूद बचा रहेगा क्योंकि एआई जनित भ्रमों, फर्जी खबरों की बाढ़ के बीच हमें सत्यापित जानकारी की ओर लौटना ही है।
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Samachar4media Bureau
प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
मीडिया की दुनिया के लिए यह सबसे कठिन समय है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने सब कुछ हिलाकर रख दिया है। अगले पांच वर्षों में न्यूज रुम का चेहरा बदलने के संकल्प के साथ इस नए ज्ञान क्षेत्र ने जितने कम समय में अपनी उपयोगिता बनाई है, वह चकित करने वाली है। जिस दौर में समूचा मीडिया विश्वसनीयता और प्रामणिकता के संकट से जूझ रहा है, ऐसे समय में एआई के लिए मीडिया समूहों का उत्साह और उसकी स्वीकार्यता वास्तव में आश्चर्य में डालने वाली है।
सही मायनों में यह वह समय है जब आंखों देखी तथा कानों सुनी बातें भी छलावा और धोखा साबित हो रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक ने सूचनाओं का ऐसा धुंधला समंदर रच दिया है, जहाँ कुछ क्षणों में फर्जी खबरें सच का लिबास पहनकर तैरने लगती हैं।
ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि खबर कितनी तेजी से आप तक पहुँच रही है, बल्कि असली चुनौती यह है कि उस पर भरोसा कितना किया जाए। मशीनी एल्गोरिदम शब्दों को सजा सकता है, आंकड़े जोड़ सकता है, लेकिन सच को तलाशने की नैतिक हिम्मत और मानवीय संवेदना केवल एक निष्पक्ष पत्रकार के पास ही होती है।
डीपफेक से मुकाबला -
युद्ध और राजनीतिक भाषणों के फर्जी वीडियो और आडियो वायरल हो जाना अब नई बात नहीं रही। पिछले चुनाव में भी कई दिवंगत नेताओं के वीडियो चले जिसमें वे अपनी पार्टी के वोट की अपीलें कर रहे हैं। जनमत को प्रभावित करने के लिए ऐसे प्रयास चरम पर हैं, जिनकी विश्वसनीयता शून्य है। 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम' की एक रिर्पोट में एआई जनित गलत सूचनाओं को दुनिया के बड़े खतरों में बताया गया है।
आज दुनिया और देश के अनेक बड़े मीडिया हाउस आधिकारिक तौर पर एआई का उपयोग डेटा विश्लेषण और अनुवाद के लिए कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि कई हजार पेज के डेटा का आंकलन -विश्लेषण सामान्य मनुष्य के लिए कई महीनों का काम है जिसे एआई के टूल्स मिनटों में संभव कर रहे हैं। बावजूद इसके अनेक मीडिया आउटलेट्स एआई से खबरें या विश्लेषण लिखवाकर हंसी के पात्र बन रहे हैं।
ऐसे में संशोधन, सुधार और मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त सामग्री से कचरा तो बढ़ ही रहा है, विश्वनीयता के नए संकट सामने हैं। बड़े भाषा माडल (एलएलएम) कभी पूरी तरह से काल्पनिक आंकड़े, अदालत के फैसला और ऐतिहासिक घटनाएं गढ़ते हुए दिखते हैं। जिसे सामान्य पाठक सच समझ बैठता है। तकनीकी विशेषज्ञ इसे हैलुसिनेशन कह रहे हैं। जिसका सीधा आशय यह है कि जिन चीजों के सटीक जवाब एआई के पास नहीं होते वह उनके मनगढंत उत्तर प्रस्तुत कर देता है। सजग संपादक और संपादकीय दृष्टि के अभाव में यह सामग्री कई तरह से संकट पैदा कर सकती है।
खबरों में सच की तलाश -
सच और झूठ का फासला बहुत कम हो गया है। खबरों का सत्यापन पत्रकारिता की पहली शर्त है। लेकिन होड़ और दौड़ में वह धूमिल हो रही है। सामान्य से लगते कामों में एआई का उपयोग तो किया जा रहा है किया भी जाना चाहिए। किंतु किसी खोजी रिपोर्ट के लिए जमीनी स्तर पर जाकर काम करना, कागजात की जांच करना पत्रकारों की ही जिम्मेदारी है। तकनीक पर अति निर्भरता के समय में हमें उसके गंभीर खतरों का भी भान होना चाहिए। मैदानी पत्रकारिता में मिट्टी की जो खुशबू है वह मैदान में उतरे बिना प्रामणिक और भरोसेमंद नहीं हो सकती।
मानवीय संस्पर्श और संवेदना किसी खबर का वितान बड़ा कर सकती है। जाहिर तौर पर पत्रकारिता की निर्भरता पूरी तरह एआई टूल्स पर संभव नहीं है। पत्रकारिता जहां निष्पक्षता, समाज के हित-सद्भाव, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर चिंतन को प्राथमिकता देती है, वहीं एल्गोरिदम का पूर्वाग्रह संभव है। अतः इसे समझने की जरुरत है। एआई माडल उसी डेटा से सीखते हैं जो उपलब्ध है। ऐसे में उपलब्ध डेटा अगर किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त है तो एआई भी उसी प्रकार के परिणाम देगा। कई शोध बताते हैं कि पश्चिमी मानकों पर ट्रेंड एआई माडल अक्सर विकासशील देशों के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों पर गलत संदर्भ प्रस्तुत करते हैं।
आसानी से अर्जित नहीं होता भरोसा -
भरोसा या विश्वास वह शब्द है जिसे प्राप्त करना आसान नहीं है। आप भले एआई का उपयोग करें किंतु जैसे ही आप यह लिखते हैं कि –“खबर एआई द्वारा बनी है और इसे मानव संपादक के द्वारा देख लिया गया है।” पाठक का भरोसा एआई जनित खबर पर तुरंत कम हो जाता है। पाठक वास्तविक पत्रकारों और लेखकों द्वारा लिखी गई सामग्री को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। कोई भी अखबार या मीडिया हाउस सालों-साल में यह प्रतिष्ठा अर्जित करता है।
उसे एआई के नए माध्यम तुरंत समाप्त कर सकते हैं। दूसरी ओर कापीराइट और बौद्धिक संपदा से जुड़े संकट भी सामने खड़े हैं। कई प्रमुख मीडिया संगठन इस बात पर आपत्ति कर रहे हैं तो कई ने बिना अनुमति और बिना भुगतान उनकी सामग्री के उपयोग के लिए एआई कंपनियों पर मुकदमे भी किए थे। ऐसे में तमाम ऐसे विवाद अभी भी एआई के साथ जुड़े हुए हैं। बताया जाता है कि इंटरनेट पर हजारों की संख्या में ऐसी वेबसाइट्स तैर रही हैं जो केवल विज्ञापन से पैसे कमाने के लिए झूठ का व्यापार कर रही हैं।
वे हर पल एआई से झूठी खबरें गढ़ते हुए पोस्ट करती रहती हैं। मीडिया वाचडाग न्यूज गार्ड ने ऐसे तमाम अविश्वसनीय वेबसाइटों की पहचान की है। ऐसे में सच और झूठ के बीच मीडिया के सत्यान्वेषण का धर्म सहम कर रह जाता है। हम सब मानते हैं संपादकीय विवेक का कभी कोई विकल्प नहीं हो सकता। इस दौर में भी यह एक सच्चाई है। नैतिक विवेक और समाज की गहरी समझ के बिना किया गया कोई भी संवाद या संचार संकट ही खड़ा करेगा।
मुख्यधारा के मीडिया की ओर लौटना होगा -
सारी तकनीकी क्रांति के बाद भी मुख्यधारा के मीडिया का वजूद बचा रहेगा क्योंकि एआई जनित भ्रमों, फर्जी खबरों की बाढ़ के बीच हमें सत्यापित जानकारी की ओर लौटना ही है। ऐसे में ‘प्रिंट इज डेड’ जैसी अवधारणाओं के बीच भी मुख्यधारा का मीडिया अपनी विशेषताओं के कारण, संपादकीय गुणवत्ता के कारण बना और बचा रहेगा। सत्य आसानी से नहीं मिलता, इसे समाज भी स्वीकारेगा।
इसके साथ ही प्रामणिक और भरोसेमंद मंचों की ओर लौटना ही होगा। क्योंकि यहां प्रामणिक मंच केवल खबरों का व्यापार नहीं कर रहे होगें बल्कि वे अपनी खबरों के सच होने के गारंटी भी देगें। जाहिर है पारंपरिक मीडिया के लिए वह दिन बहुत खास होगा। डीपफेक और एल्गोरिदम के समय में अब चुनौती ही असली और सही खबर पाना है। क्या वो आपके पास है?
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
रामास्वामी की संसद में रक्षा के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने सिब्बल को कांग्रेस का टिकट दिया।1996 का लोकसभा चुनाव सिब्बल के राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा चुनाव था।
by
Samachar4media Bureau
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने पिछले दिनों प्रेम भाटिया मेमोरियल लेक्चर में "लोकतंत्र के दो सबसे मजबूत स्तंभ प्रेस और न्यायपालिका दोनों हमें क्यों निराश कर चुके हैं" जैसे विषय पर कई गंभीर सवाल उठाए। कपिल सिब्बल कांग्रेस पार्टी का फायदा उठाकर सांसद और कानून, मानव संसाधन (शिक्षा), संचार, आईटी के साथ 'अर्थ साइंस' जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के केंद्रीय मंत्री रहे हैं। 'जमीनी साइंस' गड़बड़ होने से दिल्ली में पहले कभी सुषमा स्वराज और फिर डॉक्टर हर्षवर्धन से चुनाव हार गए। लेकिन कानूनवेत्ता होने से कानून और राजनीति के दांव-पेंच के जरिए कांग्रेस ही नहीं, लालू यादव, झारखंड मुक्ति मोर्चा, समाजवादी पार्टी आदि के समर्थन से राज्यसभा के सदस्य बने हुए हैं।
वकील होने के कारण भ्रष्टाचार या और कोई गंभीर अपराध होने पर नरसिंह राव से लेकर लालू यादव सहित नेताओं के लिए अपने नाम और काम से अदालतों को प्रभावित करते रहे हैं। मीडिया के लिए भी उन्होंने एक न्यूज चैनल शुरू किया या करवाया, लेकिन पता नहीं किस दबाव में कुछ ही महीनों में सबको निकाल बंद कर दिया। इस दृष्टि से उन्हें राजनीतिक ताकत, मीडिया और न्यायपालिका पर आधिकारिक बोलने का हक है।
सिब्बल साहब ने इस भाषण में कहा कि 'प्रेस का मुख्य काम सत्ता से कड़े सवाल पूछना और उसे जवाबदेह बनाना है। लेकिन आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अपनी इस जिम्मेदारी से पीछे हट चुका है। मीडिया घरानों के व्यावसायिक हित और सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता ने उनकी स्वतंत्रता को प्रभावित किया है। जब वित्तीय लाभ मुख्य उद्देश्य बन जाता है, तो निष्पक्ष पत्रकारिता की बलि चढ़ जाती है।
इसी तरह न्यायपालिका आज इस संस्था पर भी जनता का भरोसा कम हो रहा है।' उन्होंने इन दोनों संस्थाओं के पतन के पीछे आपस में जुड़े कारकों को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि 'पद, प्रतिष्ठा या सुरक्षा के प्रलोभन में आकर लोग अपने पेशेवर सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं।' मेरे जैसे पत्रकार इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिंह राव, मनमोहन सिंह के सत्ता काल से सत्ता, न्याय व्यवस्था, मीडिया और फिर सिब्बल साहब के उतार-चढ़ाव को लगभग तीन देखते रहे हैं। इसलिए उनकी भाषण कला की तारीफ के साथ स्वतंत्रता के अधिकार का उपयोग करते हुए यह सवाल भी उठाना चाहेंगे कि पहले भी सत्ता से मीडिया और न्यायपालिका पर दबाव के ऐतिहासिक तथ्यों की फाइलों को कैसे दबा या भुला सकते हैं?
इन दिनों जस्टिस यशवंत वर्मा के बंगले में लाखों नोटों की बोरियों के जलने के गंभीर आरोपों के सही ठहराए जाने के बाद भी उनको हटाने का मुद्दा चर्चा में है। इसलिए ध्यान आता है कि भारतीय न्यायपालिका की जवाबदेही के इतिहास में जस्टिस वी. रामास्वामी का मामला एक ऐसा अध्याय है, जिसमें न्यायाधीश पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप साबित होने के बावजूद संसद उन्हें पद से नहीं हटा सकी।
रामास्वामी पर सरकारी धन और सरकारी सुविधाओं के कथित दुरुपयोग से जुड़े 14 आरोपों की जांच हुई थी। तीन सदस्यीय जांच समिति ने अधिकांश गंभीर आरोपों को सिद्ध माना। इस भ्रष्ट जज के बचाव में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की लगभग छह घंटे की कानूनी दलील, कांग्रेस सांसदों का मतदान से अलग रहना और तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव की राजनीतिक भूमिका आज भी संसद, न्यायपालिका और मीडिया के पुराने पन्नों में दर्ज है। संसद की प्रेस गैलरी में बैठकर 1993 में मैंने भी जज को बचाने के लिए उनकी दलीलें सुनी थीं। कपिल सिब्बल के राजनीतिक जीवन की शुरुआत तभी हुई थी।
रामास्वामी की संसद में रक्षा के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने सिब्बल को कांग्रेस का टिकट दिया। 1996 का लोकसभा चुनाव सिब्बल के राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा चुनाव था। उन्हें कांग्रेस ने दक्षिण दिल्ली से उम्मीदवार बनाया। उनके सामने भाजपा की तेजतर्रार नेता सुषमा स्वराज थीं। सिब्बल चुनाव हार गए। लेकिन इस हार का अर्थ यह नहीं था कि उनका राजनीतिक करियर समाप्त हो गया।
इसके उलट, कांग्रेस ने उन्हें राजनीतिक व्यवस्था में बनाए रखा। दो वर्ष बाद सिब्बल को संसद में प्रवेश का दूसरा रास्ता मिला। 1997 में सिब्बल ने तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का चारा घोटाले में बचाव किया और अगले वर्ष लालू प्रसाद ने बिहार से राज्यसभा के लिए सिब्बल की उम्मीदवारी का समर्थन किया। उसी रिपोर्ट के अनुसार लालू ने कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को भी सिब्बल का समर्थन करने के लिए राजी किया।
8 जुलाई 1998 को वे बिहार से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य बन गए। राज्यसभा पहुंचने के बाद भी सिब्बल लालू का अदालत में और संसद में बचाव करते रहे। उन्होंने राज्यसभा में भी लालू के खिलाफ आरोपों को निराधार बताया। देर से सही, मीडिया की रिपोर्ट्स और प्रमाणों से अदालतों में भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध होने से लालू यादव को न केवल जेल जाना पड़ा, बल्कि सांसदी भी चली गई।
1993 के बाद सिब्बल केवल रामास्वामी मामले में चर्चित वकील नहीं रहे। बाद में वे पी.वी. नरसिंह राव के कानूनी बचाव दल में भी शामिल हुए। झारखंड मुक्ति मोर्चा सांसद रिश्वत कांड में आरोप था कि 1993 में नरसिंह राव सरकार को बचाने के लिए कुछ सांसदों को कथित रूप से रिश्वत दी गई थी। मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तक गया। उपलब्ध कानूनी स्रोत में पी.पी. राव, डी.डी. ठाकुर और कपिल सिब्बल को अपीलकर्ताओं के वकीलों में दर्ज किया गया है। वैसे इस मामले में उनके प्रमुख वकील के रूप में आर.के. आनंद का नाम है।
आर.के. आनंद बाद में 2000 में झामुमो के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे। यही नहीं, कपिल सिब्बल ने नरसिंह राव और चंद्रास्वामी दोनों का बचाव किया था। यह लखूभाई पाठक पर धोखाधड़ी का प्रकरण था। आरोप था कि 1983 में तत्कालीन विदेश मंत्री पी.वी. नरसिंह राव, चंद्रास्वामी और उनके सहयोगी "मामाजी" ने ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के व्यवसायी लखूभाई पाठक से कथित रूप से 100,000 डॉलर की धोखाधड़ी की।
सीबीआई का आरोप था कि भारत में न्यूजप्रिंट पेपर पल्प का ठेका दिलाने का वादा किया गया था। जब अदालत ने राव को बरी करने का फैसला सुनाया, तब राव ने सिब्बल को गले लगाया था। राजनीतिक गलियारों में कहा यही जाता रहा कि इस तरह के मामलों में सिब्बल साहब के रिश्तों का असर न्यायपालिका पर रहा।
सिब्बल साहब ने अपने भाषण में मीडिया मालिकों और पत्रकारों पर इस समय भारी दबाव और विदेशी पूर्वाग्रही रिपोर्ट्स का हवाला दिया है। यहाँ भी वे काले पन्ने भूल गए या भुलाने की कोशिश कर रहे हैं। मैं भाजपा या उनके समर्थकों की तरह केवल आपातकाल की बात भी नहीं कर रहा हूँ। स्वतंत्र भारत में प्रेस की आर्थिक स्वतंत्रता से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा सरकार द्वारा 1960 में जारी आदेश से अखबार के कीमत और पृष्ठों की संख्या के बीच संबंध नियंत्रित किया जाना था।
1962 में एक आदेश के तहत सरकार कागज आयात, कोटा, पृष्ठ संख्या और उपयोग को नियंत्रित करती थी। फिर 1972–73 में तो कठोर न्यूजप्रिंट नीति में कठोर प्रतिबंध लगाए गए, तो बड़े प्रकाशक अदालत गए। इंडियन एक्सप्रेस ही नहीं, प्रादेशिक अखबारों पर कांग्रेस सरकारों, नेताओं का दबाव, विज्ञापन रोकने, आर्थिक आरोपों के मामले दर्ज करने के रिकॉर्ड हैं।
बिहार में जगन्नाथ मिश्रा द्वारा लाया गया प्रेस कानून, राजीव गांधी सरकार में लाया गया मानहानि कानून प्रेस पर खतरों की तरह माने गए। लालू यादव ने चारा कांड छापने पर 1990 में पटना में प्रेस पर सीधा हमला करवा दिया, तब मैं उसी अखबार का संपादक था और पहली खबर भी लिखी थी। खैर, हमले के बाद भी हमने लिखना बंद नहीं किया। उत्तर प्रदेश में समाजवादी सीएम मुलायम सिंह यादव के राज में अखबारों पर 'हल्ला बोल' के तहत हमले के तथ्य कैसे न भुलाए जा सकते हैं? अब ऐसे हमले तो कहीं नहीं हो रहे हैं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
Pidilite Industries ने FY2025-26 की अपनी एनुअल रिपोर्ट को दिवंगत पीयूष पांडेय को श्रद्धांजलि में बदलकर इसे खास बना दिया है।
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Samachar4media Bureau
गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक ।।
हर साल की एनुअल रिपोर्ट तैयार करना चेयरमैन के ऑफिस के लिए हमेशा एक महत्वपूर्ण काम रहा है। बड़ी कंपनियों के लिए यह सिर्फ एक कानूनी या जरूरी दस्तावेज नहीं होता। यह कंपनी के पूरे साल के प्रदर्शन, उसकी सोच, मूल्यों, पहचान और सफर को सामने रखने का एक मौका भी होता है। इसकी डिजाइन, फोटोग्राफी, प्रोडक्शन और प्रेजेंटेशन पर काफी सोच-विचार किया जाता है। पहले कंपनियां इन रिपोर्ट्स को अच्छे और महंगे कागज पर प्रिंट करवाती थीं और शेयरहोल्डर्स, इन्वेस्टर्स और दूसरे स्टेकहोल्डर्स को सावधानी से डाक के जरिए भेजती थीं।
टेक्नोलॉजी ने इस परंपरा को बदल दिया है। आज एनुअल रिपोर्ट्स तेजी से डिजिटल रूप में उपलब्ध हो रही हैं। इन्हें कॉरपोरेट वेबसाइट्स पर अपलोड किया जाता है और इलेक्ट्रॉनिक तरीके से शेयर किया जाता है। इसकी सुविधा से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन एक खूबसूरती से तैयार एनुअल रिपोर्ट को हाथ में पाने और उसे देखने का जो भौतिक और भावनात्मक अनुभव था, वह कहीं न कहीं कम जरूर हुआ है।
यही वजह है कि Pidilite Industries ने अपनी FY2025-26 एनुअल रिपोर्ट में जो किया है, वह खास तौर पर दिलचस्प है। कंपनी ने एक सामान्य कॉरपोरेट प्रक्रिया को भारतीय विज्ञापन जगत के सबसे चर्चित क्रिएटिव दिमागों में से एक, दिवंगत पीयूष पांडेय को श्रद्धांजलि में बदल दिया है।
जो लोग भारतीय विज्ञापन जगत को करीब से देखते और समझते रहे हैं, उनके लिए Pidilite और पीयूष पांडेय का रिश्ता एक बेहद खास कहानी है। पीयूष पांडेय का Fevicol के साथ रिश्ता 1980 के दशक के मध्य में शुरू हुआ था। उस समय Fevicol किसी विज्ञापन प्रोफेशनल के लिए कोई बहुत बड़ा क्रिएटिव ब्रैंड नहीं माना जाता था। Fevicol एक चिपकाने वाला प्रॉडक्ट था। इसमें Cadbury या Asian Paints जैसे ब्रैंड्स वाली ग्लैमर या भावनात्मक अपील नहीं थी। लेकिन पीयूष पांडेय और उनकी टीम ने वह देखा, जो शायद दूसरे लोग नहीं देख पाए। उन्होंने समझा कि रोजमर्रा के इस्तेमाल वाला कोई प्रॉडक्ट भी हास्य, समझदारी और पूरी तरह भारतीय अंदाज के साथ पेश किए जाने पर एक सांस्कृतिक ब्रैंड बन सकता है।
समय के साथ Fevicol सिर्फ एक प्रोडक्ट नहीं रह गया। उसके विज्ञापन लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गए। इसके मशहूर किरदार, परिस्थितियां, हास्य और याद रह जाने वाली लाइनों ने ब्रैंड को तुरंत पहचान दिलाई। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह रही कि पीयूष पांडेय की क्रिएटिव सोच Pidilite के पोर्टफोलियो के कई दूसरे ब्रैंड्स तक भी पहुंची, जिनमें Fevikwik, M-Seal और Dr Fixit शामिल हैं।
नई एनुअल रिपोर्ट इसी असाधारण क्रिएटिव सफर को फिर से सामने लाती है। इसमें How to Fish the Fevikwik Way, Dum Laga Ke Haisha, The Egg that Hatched a Legend, The Journey that Fevicol Bus Took, The Will that Changed the Game for M-Seal और The Fevikwik Kabadiwalli Fix जैसे कैंपेन के पीछे की कहानियों को शामिल किया गया है।
इस पूरी कोशिश को खास बनाने वाली बात यह है कि रिपोर्ट में सिर्फ विज्ञापनों को दोबारा पेश नहीं किया गया है। इसमें उन सोच, क्रिएटिविटी, सांस्कृतिक समझ और मानवीय जुड़ाव को सामने लाने की कोशिश की गई है, जिसकी वजह से ये कैंपेन लोगों को लंबे समय तक याद रहे। इस तरह Pidilite ने एनुअल रिपोर्ट को एक कॉरपोरेट पब्लिकेशन से आगे बढ़ाकर भारतीय विज्ञापन इतिहास के एक दस्तावेज जैसा बना दिया है।
रिपोर्ट का आखिरी अध्याय, जिसका नाम बिल्कुल सही तरीके से End of an Era रखा गया है, पीयूष पांडेय को भारतीय विज्ञापन में उनके योगदान के लिए सम्मानित करते हुए इस पूरी श्रद्धांजलि को एक साथ जोड़ता है। Pidilite, उसके बोर्ड, Ogilvy, Prasoon पीयूष पांडेय और इस लंबे जुड़ाव का हिस्सा रहे दूसरे लोगों के योगदान ने इस रिपोर्ट को सिर्फ एक कॉरपोरेट पब्लिकेशन नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक सामूहिक श्रद्धांजलि में बदल दिया है।
इसमें दूसरी कंपनियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण सीख है।
एनुअल रिपोर्ट्स को अक्सर ऐसे दस्तावेज के तौर पर देखा जाता है, जिनका मुख्य उद्देश्य शेयरहोल्डर्स और एनालिस्ट्स को जानकारी देना होता है। लेकिन किसी कंपनी की एनुअल रिपोर्ट उसकी कॉरपोरेट पहचान और व्यक्तित्व को सामने रखने का एक माध्यम भी बन सकती है। यह ऐसी कहानियां बता सकती है, जिन्हें सिर्फ आंकड़ों के जरिए नहीं बताया जा सकता। आज जब लोग हर दिन बड़ी मात्रा में कंटेंट देख रहे हैं, ऐसे में कुछ ऐसा तैयार करना जिसे लोग संभालकर रखना, देखना और दूसरों के साथ शेयर करना चाहें, अपने आप में कम्युनिकेशन का एक प्रभावी तरीका बन सकता है।
Pidilite ने यह भी दिखाया है कि कॉरपोरेट विरासत को आज के समय के हिसाब से कैसे पेश किया जा सकता है। सिर्फ कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन की बात करने के बजाय, रिपोर्ट कंपनी की सांस्कृतिक और क्रिएटिव विरासत के एक महत्वपूर्ण हिस्से का जश्न मनाती है। यह पाठकों को याद दिलाती है कि सफल ब्रैंड्स के पीछे सिर्फ आंकड़े नहीं होते, बल्कि लोग, आइडिया, जोखिम, असफलताएं और दशकों तक चलने वाले क्रिएटिव प्रयोग भी होते हैं।
इस विचार को आगे बढ़ाने की भी काफी संभावना है। आखिर यह श्रद्धांजलि सिर्फ एनुअल रिपोर्ट तक ही सीमित क्यों रहे? Pidilite संभावित तौर पर इस क्रिएटिव विरासत को एक खूबसूरती से डिजाइन किए गए कैलेंडर में बदल सकती है, जिसमें Fevicol और Fevikwik के सफर के कुछ सबसे यादगार कैंपेन शामिल हों। ऐसा कैलेंडर विज्ञापन एजेंसियों, ऑफिस, रिटेल आउटलेट्स और यहां तक कि विज्ञापन के शौकीन लोगों के घरों तक भी पहुंच सकता है।
इसके अलावा प्रदर्शनियां, डिजिटल आर्काइव, शॉर्ट फिल्में, सोशल मीडिया स्टोरीटेलिंग और यहां तक कि Pidilite के ब्रैंड्स के क्रिएटिव सफर को दिखाने वाली एक घूमने वाली प्रदर्शनी भी तैयार की जा सकती है। हर कैंपेन के पीछे एक कहानी है और हर कहानी लोगों से जुड़ने का एक नया मौका पैदा कर सकती है।
शायद यही इस एनुअल रिपोर्ट की सबसे बड़ी खासियत है। इसने ऐसे दस्तावेज को, जिसे आम तौर पर बैलेंस शीट, परफॉर्मेंस के आंकड़ों और शेयरहोल्डर्स के साथ कम्युनिकेशन से जोड़ा जाता है, एक भावनात्मक पहलू दे दिया है।
इस तरह Pidilite ने सिर्फ पीयूष पांडेय को सम्मान नहीं दिया है। उसने एक आइडिया की ताकत को भी सम्मान दिया है और कॉरपोरेट जगत को यह याद दिलाया है कि कई बार सबसे प्रभावी एनुअल रिपोर्ट वही होती है, जिसे लोग आंकड़े पढ़ लेने के काफी समय बाद भी याद रखते हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
जेन ज़ी की बदलती पसंद, डिजिटल आदतें और सांस्कृतिक जुड़ाव ब्रांडों, मीडिया और मार्केटिंग की रणनीतियों को नए तरीके से सोचने पर मजबूर कर रहे हैं।
by
Samachar4media Bureau
गणपति विश्वनाथन, स्वतंत्र कम्युनिकेशन कंसल्टेंट।
भारत में नई पीढ़ी के रूप में जेन ज़ी (Gen Z) तेजी से उभर रही है और उसका असर ब्रांड, मीडिया और मार्केटिंग की रणनीतियों पर साफ दिखाई देने लगा है। हालिया सीजेपी (CJP) प्रदर्शन ने सोशल मीडिया पर युवाओं की सक्रियता और उनकी अलग तरह की अभिव्यक्ति को सामने रखा। इससे यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि यह नई ऑडियंस कौन है और आने वाले समय में बाजार को किस तरह प्रभावित करेगी।
भारत में जेन ज़ी को सामान्य तौर पर 1990 के दशक के अंत से 2010 के शुरुआती वर्षों के बीच जन्मी पीढ़ी माना जाता है। इसमें लगभग 13 से 28 वर्ष की उम्र के युवा शामिल हैं। इनके लिए शिक्षा और करियर महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सीखने के तरीके बदल चुके हैं। स्कूल और कॉलेज के अलावा यूट्यूब, पॉडकास्ट, ऑनलाइन कोर्स और सोशल मीडिया क्रिएटर भी इनके ज्ञान के स्रोत बन गए हैं। यह पीढ़ी अच्छी कमाई के साथ स्वतंत्रता, लचीलापन, अनुभव और अपनी पसंद से जीवन जीने को भी महत्व देती है। उद्यमिता, फ्रीलांसिंग और क्रिएटर इकॉनमी जैसे विकल्प भी इन्हें आकर्षित कर रहे हैं। इनके रोल मॉडल भी बदल रहे हैं। फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों के साथ-साथ कारोबारी, गेमर, संगीतकार और ऑनलाइन कंटेंट क्रिएटर भी इनके लिए प्रभावशाली बन चुके हैं।
स्मार्टफोन इनके जीवन का केंद्र है, लेकिन इनके डिजिटल संसार में ईयरबड्स, स्मार्टवॉच, लैपटॉप, टैबलेट और गेमिंग डिवाइस भी शामिल हैं। खरीदारी से पहले ये ऑनलाइन रिसर्च, रिव्यू, कीमतों की तुलना और क्रिएटर की राय देखते हैं। इसलिए इन्हें केवल उपभोक्ता मानना पर्याप्त नहीं है। ये सवाल करते हैं, तुलना करते हैं, टिप्पणी करते हैं और अपने अनुभव साझा करते हैं। यही वजह है कि पारंपरिक आय, उम्र, शिक्षा और स्थान आधारित टारगेट ऑडियंस की परिभाषा बदल रही है। अब डिजिटल व्यवहार और तकनीक के इस्तेमाल को भी समझना जरूरी हो गया है।
भारत की जेन ज़ी को केवल पश्चिमी नजरिए से समझना भी सही नहीं होगा। भाषा, खान-पान, संगीत, फैशन, त्योहार और स्थानीय संस्कृति इनके लिए महत्वपूर्ण हैं। एक युवा वैश्विक कंटेंट देखने के साथ अपनी भाषा और परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा रह सकता है। ब्रांडों के लिए चुनौती यह है कि वे युवाओं की भाषा की नकल करने के बजाय उनके मूल व्यवहार और मूल्यों को समझें। इन्फ्लुएंसर, शॉर्ट वीडियो, गेमिंग, मीम, समुदाय और यूजर-जेनरेटेड कंटेंट इसके महत्वपूर्ण माध्यम बन रहे हैं। लेकिन जेन ज़ी बनावटीपन को जल्दी पहचान लेती है और ब्रांड से बातचीत में भागीदारी चाहती है।
एआई (AI) भी इस बदलाव को और तेज कर सकता है। इससे ब्रांड बड़े पैमाने पर उपभोक्ताओं के व्यवहार और रुचियों का विश्लेषण कर सकते हैं, लेकिन आंकड़े यह बता सकते हैं कि लोग क्या कर रहे हैं, हमेशा यह नहीं बता सकते कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। इसलिए मानवीय समझ जरूरी रहेगी। जेन ज़ी सिर्फ एक नई टारगेट ऑडियंस नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि भविष्य की ऑडियंस उम्र या आय से ज्यादा डिजिटल व्यवहार, संस्कृति, रुचियों, आकांक्षाओं और तकनीक से जुड़ाव के आधार पर पहचानी जाएगी। यही बदलाव ब्रांडों के लिए सबसे बड़ा अवसर और चुनौती है।
(गणपति विश्वनाथन 'मास्टरिंग द मैसेज' पुस्तक के लेखक हैं और यह उनके निजी विचार हैं।)
अब सवाल है कि क्या यह कमाई छोड़ी जा सकती है? रिजर्व बैंक हर साल नोट छापने पर करीब 5 हजार करोड़ रुपये खर्च करता है तो डिजिटल पेमेंट के लिए सब्सिडी देने में क्या हर्ज है?
by
Samachar4media Bureau
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
यूपीआई (UPI) यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (Unified Payments Interface) से पेमेंट करते हैं तो अभी कोई चार्ज नहीं लगता है। लेकिन आप क्रेडिट या डेबिट कार्ड से पेमेंट करते हैं तो दुकानदार को चार्ज सर्विस प्रोवाइडर (Visa, MasterCard) को देना पड़ता है। अगर यही पेमेंट आप RuPay कार्ड से करते हैं तो कोई चार्ज नहीं लगता है। कानून में प्रस्तावित बदलाव के बाद UPI और RuPay कार्ड पर भी चार्ज लग सकता है, लेकिन वो आपको नहीं, दुकानदार को चुकाना पड़ेगा।
हफ्ते भर से सोशल मीडिया पर बहस चल रही है कि UPI फ्री नहीं रहेगा। सरकार रोजाना सफाई दे रही है। दरअसल, लोकसभा ने कानून पारित कर दिया है कि UPI और RuPay पेमेंट पर अब MDR यानी Merchant Discount Rate लग सकता है। यह चार्ज दुकानदार या कोई भी कंपनी सर्विस प्रोवाइडर को देती है। 2020 से पहले RuPay और UPI पर भी MDR लगता था। यह चार्ज लेनदेन में शामिल बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और NPCI के बीच बंटता था। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (National Payments Corporation of India) यानी NPCI ही UPI का संचालन करता है।
सरकार ने स्वदेशी पेमेंट सिस्टम को बढ़ावा देने के लिए इस पर MDR जीरो कर दिया था। अमेरिकी कंपनी Visa और MasterCard को यह छूट नहीं मिली। MDR हटाने का बहुत बड़ा फायदा हुआ। UPI से आज हर रोज करीब 75 करोड़ पेमेंट हो रहे हैं, जबकि 5 साल पहले यह आंकड़ा करीब 10 करोड़ था। UPI से अब हर रोज करीब 1 लाख करोड़ रुपये का पेमेंट हो रहा है, जबकि 5 साल पहले यह आंकड़ा करीब 20 हजार करोड़ रुपये था।
UPI को चलाने का खर्च पेमेंट कंपनियां और बैंक उठा रही हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुमान के मुताबिक, यह खर्च करीब 20 हजार करोड़ रुपये है। सरकार हर साल करीब 2 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी देती है। UPI को चलाने के लिए सर्वर और टेक्नोलॉजी का खर्च होता है। जैसे-जैसे UPI का इस्तेमाल बढ़ रहा है, यह खर्च भी बढ़ता जा रहा है। सिस्टम अपग्रेड करने की जरूरत है। पिछले साल भर में कई बार UPI ठप होने की खबरें भी आई थीं।
रॉयटर्स के मुताबिक, MDR ₹2,000 से ज्यादा के लेनदेन पर ही विचार किया जा रहा है। यह चार्ज भी उन दुकानदारों या कंपनियों पर लगेगा, जिनका टर्नओवर डेढ़ करोड़ रुपये से ज्यादा है। सरकार का कहना है कि UPI पर MDR क्रेडिट और डेबिट कार्ड से कम होगा। यह रेट 0.3 से 0.5% होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसका मतलब हुआ कि ₹5,000 का सामान खरीदा तो ₹15 से ₹25 दुकानदार चुकाएगा। लोग एक-दूसरे से लेनदेन करेंगे तो उन्हें कोई चार्ज नहीं लगेगा, चाहे अमाउंट कितना भी हो।
अभी ₹2,000 से ज्यादा के UPI पेमेंट हर दिन 100 में से 4 ही होते हैं, लेकिन इसकी वैल्यू 100 रुपये में से ₹67 होती है। जेफरीज (Jefferies) का अनुमान है कि MDR लगने से हर साल 5 से 10 हजार करोड़ रुपये की कमाई होगी। अब सवाल है कि क्या यह कमाई छोड़ी जा सकती है? रिजर्व बैंक हर साल नोट छापने पर करीब 5 हजार करोड़ रुपये खर्च करता है तो डिजिटल पेमेंट के लिए सब्सिडी देने में क्या हर्ज है? कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि रिजर्व बैंक सरकार को 2 लाख 86 हजार करोड़ रुपये डिविडेंड देता है, उसका एक हिस्सा सब्सिडी में दिया जाना चाहिए।
इसके साथ ही अमेरिका के दबाव की बात आ रही है। जयराम रमेश ने यह आरोप भी लगाया है कि RuPay के कारण अमेरिका की कंपनियों MasterCard और Visa को नुकसान हुआ है। इसी वजह से UPI और RuPay पर वापस MDR लाया जा रहा है। अमेरिका शिकायत कर चुका है कि उसकी कंपनियों को Level Playing Field नहीं मिल रही है। हालांकि, सरकार इस आरोप से इनकार करती है कि यह फैसला अमेरिका के दबाव में लिया जा रहा है।
वित्त मंत्री ने कहा कि रमेश दुष्प्रचार कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप के बीच इतना तय है कि फिलहाल आपके लिए UPI फ्री रहेगा। दुकानदार को जरूर पेमेंट करना पड़ सकता है। वैसे भी यह कानून राज्यसभा में पास होना है। फिर राष्ट्रपति को मंजूरी देनी है। इसके बाद रिजर्व बैंक और अन्य संस्थाओं को तय करना होगा कि कितना चार्ज लगेगा और कैसे लगेगा?
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
केंद्र और अनेक राज्यों में भाजपा की सरकारें आने के बाद कॉलेजों, विश्वविद्यालयों अथवा उनके प्रशासनिक संस्थानों में हुई नियुक्तियों में भी कई लोग रखे गए हैं।
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Samachar4media Bureau
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस सप्ताह मुंबई में जेन जी और जेन-अल्फा कहे जाने वाले समूह से संवाद किया। उन्होंने कहा- हमें उनकी बात सुननी चाहिए। उनसे बातचीत में कमी थी, इसीलिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन हुआ। नीट पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के बाद इसे युवाओं के साथ संघ की ओर से सबसे अहम संवाद माना जा रहा है। उनका कहना है कि 'अगर सरकार ने पहले ही बात कर ली होती, तो आंदोलन की जरूरत नहीं होती। आंदोलन भी बातचीत का एक तरीका है। आंदोलन हमारे या आपके खिलाफ नहीं, बल्कि सिस्टम में सुधार के लिए होना चाहिए।'
इस तरह की पहल अच्छी है, क्योंकि केंद्र की भाजपा सरकार को संघ के साथ संबंधों को लेकर अधिक चर्चा होती है। यूं संघ दावा यही करता है कि वह सरकार के कामकाज में कोई हस्तक्षेप नहीं करता। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनके सहयोगी अमित शाह, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी सहित अधिकांश नेता संघ के ही शिक्षित-प्रशिक्षित हैं। सत्ता में आने के बाद दशकों से शिक्षा, संस्कृति जैसे क्षेत्रों में वामपंथी कम्युनिस्ट विचारों और उनके लोगों को बदलकर सरकार ने विभिन्न संस्थानों में समान विचार के लोगों की नियुक्तियां की हैं। इसलिए हाल के वर्षों में शिक्षा के क्षेत्रों में हुई गड़बड़ियों के आरोप कुछ लोगों पर लगते रहे हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने पिछले लगभग 100 वर्षों में शिक्षा, समाजसेवा, महिला, युवा, जनजातीय, मजदूर, किसान, छात्र, धार्मिक एवं सेवा कार्यों के लिए अनेक स्वतंत्र संगठनों का निर्माण या प्रेरणा दी है। इन संगठनों का अपना अलग पंजीकरण, कार्यप्रणाली और नेतृत्व होता है, हालांकि इन्हें व्यापक रूप से "संघ परिवार" का हिस्सा माना जाता है। संघ की गतिविधियों को पत्रकार के रूप में 1971 से देखता रहा हूं और पूर्व संघ प्रमुखों के इंटरव्यू भी किए हैं। इसलिए सवाल उठता है कि छात्र आंदोलन और सरकार के बीच हुए तनाव और टकराव के दौरान संघ के इतने बड़े नेटवर्क, विद्यार्थी संगठन, शिक्षक समुदाय आदि ने कोई हस्तक्षेप क्यों नहीं किया? सरकार से भी संवादहीनता की बात कम से कम मेरे गले-दिमाग में नहीं उतर सकती। संघ से शिक्षा क्षेत्र में जुड़े संगठनों के दावों पर ही ध्यान दीजिए।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने 2025–26 में अपनी सदस्य संख्या 76,98,448 (लगभग 77 लाख) बताई है। यह संगठन का अब तक का सबसे बड़ा सदस्यता आंकड़ा बताया गया। स्वयं को भारत का सबसे बड़ा छात्र संगठन बताती है। यह विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र हित, शिक्षा सुधार, शोध, छात्रवृत्ति, परीक्षा, रोजगार तथा राष्ट्रीय विषयों पर अभियान चलाती है। समर्थक इसे सक्रिय छात्र संगठन मानते हैं, जबकि आलोचक इसके राजनीतिक और वैचारिक प्रभाव पर प्रश्न उठाते हैं।
इसी तरह संघ से जुड़े संगठन विद्या भारती द्वारा जारी नवीन आंकड़ों के अनुसार उनके 12,791 स्कूल में करीब 1 लाख 50 हजार शिक्षक और लगभग 32 लाख 50 हजार छात्र हैं। विद्यार्थी परिषद और विद्या भारती का नेटवर्क आकार की दृष्टि से भारत के सबसे बड़े छात्र एवं निजी शैक्षिक नेटवर्कों में से एक है। इनके शिक्षा में योगदान का मूल्यांकन अलग-अलग दृष्टिकोणों से किया जाता है—समर्थक इसे विद्यालय विस्तार, अनुशासन और संस्कार आधारित शिक्षा का महत्वपूर्ण मॉडल मानते हैं। यह बात स्वीकार की जानी चाहिए कि अनेक राज्यों में बोर्ड परीक्षाओं में इन स्कूलों के बच्चों के अच्छे परिणाम आए। संघ की ऐसी संस्थाओं से जनजातीय एवं दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा का विस्तार हुआ। कोविड काल में डिजिटल शिक्षा अभियान में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। संघ से जुड़े एक और संगठन वनवासी कल्याण आश्रम ने पिछले 75 वर्षों के दौरान हजारों छात्रावास, विद्यालय एवं स्वास्थ्य परियोजनाएं चलाईं, जिसका लाभ आदिवासी इलाकों में हुआ। खासकर नक्सल प्रभावित अथवा पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय विदेशी मिशनरियों के प्रभाव को रोकने में इनकी सकारात्मक भूमिका रही।
II. संघ से जुड़े 12,654 अनौपचारिक शिक्षा केंद्रों में 11,143 शिक्षक तथा 2,45,403 छात्र हैं। मतलब औपचारिक और अनौपचारिक संस्थानों को मिलाकर लगभग 1.6 लाख शिक्षक इस नेटवर्क से जुड़े बताए जाते हैं। संघ से जुड़े बाल संस्कार केंद्र एवं एकल विद्यालय अभियान (ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों में एक शिक्षक मॉडल) से भी लाखों परिवारों को जोड़ा गया है। इन संगठनों का कहना है कि उनका उद्देश्य राष्ट्र निर्माण, सेवा, सांस्कृतिक संरक्षण और चरित्र निर्माण है तथा वे अपने कार्यों को सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से देखते हैं। संघ परिवार से जुड़े प्रत्यक्ष एवं प्रेरित संगठनों की संख्या 100 से अधिक मानी जाती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार में आने पर पूरी तैयारी के बाद 2020 में क्रांतिकारी बदलाव वाली नई शिक्षा नीति की घोषणा की। उसमें संघ की मूल विचारधारा का समावेश है। 2047 के "विकसित भारत" के लिए शिक्षा का एजेंडा केवल स्कूल-कॉलेजों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसमें ज्ञान, कौशल, रोजगार, शोध, तकनीक, भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा, नैतिक/संवैधानिक मूल्य और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को एक साथ जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। नीति आयोग के शिक्षा नीति @2047 दस्तावेज में शिक्षा को सीधे विकसित भारत की मानव क्षमता, उत्पादकता और सामाजिक गतिशीलता से जोड़ा गया है। दस्तावेज लगभग 25 करोड़ स्कूली और 4 करोड़ उच्च शिक्षा विद्यार्थियों के विशाल तंत्र का उल्लेख करता है और स्थानीय भाषाओं, व्यक्तिगत सीखने तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को महत्वपूर्ण मानता है।
संघ और उससे जुड़े शिक्षा-विचार में यह मुद्दा लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है कि भारतीय बच्चे अपनी भाषा और संस्कृति से कटकर शिक्षा न लें। नई शिक्षा नीति में भी मातृभाषा/स्थानीय भाषा में प्रारंभिक शिक्षा को महत्व दिया गया है। यहीं संघ और सामान्य सरकारी शिक्षा नीति के बीच सबसे स्पष्ट वैचारिक संबंध दिखाई देता है। संघ से जुड़े शिक्षा विमर्श में शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टि, आधुनिक विज्ञान, चरित्र निर्माण तथा राष्ट्रबोध माना जाता है। इसी दिशा में भारतीय शिक्षा बोर्ड का उदाहरण महत्वपूर्ण है। उसके आधिकारिक दस्तावेजों में भारतीय संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा को जोड़ने की बात कही गई है। बहरहाल, 2047 की शिक्षा के लिए सबसे बेहतर मॉडल वह होगा जिसमें भारतीय परंपरा का अध्ययन भी हो और आधुनिक वैज्ञानिक सोच भी मजबूत हो।
केंद्र और अनेक राज्यों में भाजपा की सरकारें आने के बाद कॉलेजों, विश्वविद्यालयों अथवा उनके प्रशासनिक संस्थानों में हुई नियुक्तियों में भी कई लोग रखे गए हैं। सभी संस्थानों के दावों को ठीक माना जाए तो युवा पीढ़ी में लगभग दो करोड़ लोग हैं। उनके परिवारों की सदस्य संख्या दस करोड़ तक हो सकती है। तब भी क्या शिक्षा क्षेत्रों की समस्याओं और गड़बड़ियों का पता नहीं चल सका? सांसदों, विधायकों, पार्षदों ने क्या भूमिका निभाई? इस दृष्टि से संघ और भाजपा को युवा असंतोष के समाधान में सहयोग के मुद्दे पर गंभीरता से अपने संगठनों और सत्ता से लाभान्वित हो रहे लोगों के कामकाज और रवैये की समीक्षा करना चाहिए। प्रतिपक्ष के राजनीतिक संगठनों की तरह केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को दोषी बता कथित स्वयंसेवकों द्वारा खुद अधिक लाभ पाने की कोशिशों और दबाव बनाने से भविष्य सुरक्षित नहीं होगा। दस वर्षों में उन्हें मोदी सरकार से बहुत लाभ हुआ है। उनकी सुविधाओं में बढ़ोतरी हुई और समाज में अधिक महत्व मिलने लगा है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मुंबई के कार्यक्रम में माना है कि 'शिक्षा सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। सबको अपने-अपने स्तर पर सहयोग करना होगा। हमने देखा है कि कई गांवों के स्थानीय लोगों ने बच्चों की शिक्षा के लिए मिलजुलकर अच्छे प्रयास किए हैं।'
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
पारंपरिक मीडिया की बंधी-बंधाई और एकरस शैली से अलग हटकर जब भारतीय नागरिक इस पर विचरण करने लगे तो लगा कि रचनात्मकता और सृजनात्मकता का यहां विस्फोट हो रहा है।
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Samachar4media Bureau
प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
भारतीय समाज में किसी नए प्रयोग को लेकर इतनी स्वीकार्यता कभी नहीं थी, जितनी कम समय में सोशल मीडिया ने अर्जित की है। जब इसे सोशल मीडिया कहा गया तो कई विद्वानों ने पूछा “अरे भाई क्या बाकी मीडिया अनसोशल है? अगर वे भी सामाजिक हैं,तो यह सामाजिक मीडिया कैसे?” किंतु समय ने साबित किया कि यह वास्तव में सोशल मीडिया है। अब उससे आगे डीफफेक ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है।
जनरेटिव एआई और डीपफेक टूल्स की मदद से अब किसी भी व्यक्ति का फर्जी वीडियो या ऑडियो बनाना बेहद आसान और सस्ता हो गया है। कुछ ही सेकंड के ऑडियो या वीडियो सैंपल से तैयार यह तकनीक आम आदमी से लेकर दिग्गजों तक की पहचान के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।
सृजनात्मकता का विस्फोट-
पारंपरिक मीडिया की बंधी-बंधाई और एकरस शैली से अलग हटकर जब भारतीय नागरिक इस पर विचरण करने लगे तो लगा कि रचनात्मकता और सृजनात्मकता का यहां विस्फोट हो रहा है। दृश्य, विचार, कमेंट् और निजी सृजनात्मकता के अनुभव जब यहां तैरने शुरू हुए तो लोकतंत्र के पहरूओं और सरकारों का भी इसका अहसास हुआ। आज वे सब भी अपनी सामाजिकता के विस्तार के लिए सोशल मीडिया पर आ चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं भी कहा कि “सोशल मीडिया नहीं होता तो हिंदुस्तान की क्रियेटिविटी का पता ही नहीं चलता।”
सोशल मीडिया अपने स्वभाव में ही बेहद लोकतांत्रिक है। जाति, धर्म, भाषा, लिंग और रंग की सीमाएं तोड़कर इसने न सिर्फ पारंपरिक मीडिया को चुनौती दी है वरन् यह सही मायने में आम आदमी का माध्यम बन गया है। इसने संवाद को निंरतर, समय से पार और लगातार बना दिया है। इसने न सिर्फ आपकी निजता को स्थापित किया है वरन एकांत को भी भर दिया है।
निजता अब सामूहिक संवाद में बदल रही-
सूचनाएं आज मुक्त हैं और वे इंटरनेट के पंखों पर उड़ रही हैं। सूचना 21 वीं सदी की सबसे बड़ी ताकत बनी तो सोशल मीडिया, सभी उपलब्ध मीडिया माध्यमों में सबसे लोकप्रिय माध्यम बन गया। सूचनाएं अब ताकतवर देशों, बड़ी कंपनियों और धनपतियों द्वारा चलाए जा रहे प्रचार माध्यमों की मोहताज नहीं रहीं। वे कभी भी वायरल हो सकती हैं और कहीं से भी वैश्विक हो सकती हैं। स्नोडेन और जूलियन असांजे को याद कीजिए। सूचनाओं ने अपना अलग गणतंत्र रच लिया है। निजता अब सामूहिक संवाद में बदल रही है। वार्तालाप अब वैश्विक हो रहे हैं।
इस आभासी दुनिया में आपका होना ही आपको पहचान दिला रहा है। “ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय” कहने वाले देश में अब एक वाक्य का विचार क्रांति बन रहा है। यही विचार की ताकत है कि वह किताबों और विद्वानों के इंतजार में नहीं है।
सोशल साइट्स का समाजशास्त्र अलग है। यहां ट्वीट फैशन भी है और सामाजिक काम भी। फेसबुक और ट्विटर नए गणराज्य हैं। निजी जिंदगी से लेकर जनांदोलन और चुनावों तक अपनी गंभीर मौजूदगी को दर्ज करवा रहा ये माध्यम, सबको आवाज और सबकी वाणी देने के संकल्प से लबरेज है। कंप्यूटर से आगे अब स्मार्ट होते मोबाइल इसे गति दे रहे हैं। यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी-
अपने तमाम नकारात्मक प्रभावों के बावजूद इसके उपयोग के प्रति बढ़ती ललक बताती है कि सोशल मीडिया का यह असर अभी और बढ़ने वाला है। यह मान लेने में हिचक नहीं करनी चाहिए कि यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी। झूठ, बेईमानी, अपराध और बेवफाई के किस्से हैं तो दूसरी तरफ निभ रही दोस्तियों की लंबी कहानियां हैं। हो चुकी और चल रही शादियों की लंबी श्रृंखला है। कभी किसी भी माध्यम के प्रति इतना स्वागत भाव नहीं था।
फिल्में आई तो अच्छे घरों के लोग न इसमें काम करते थे, ना ही वे फिल्में देखने जाते थे। मां-पिता से छिपकर युवा सिनेमा देखने जाते थे। टीवी आया तो उसे भी इडियट बाक्स कहा गया। टीवी को लगातार देखते हुए भी हिंदुस्तान उसके प्रति आलोचना के भाव से भरा रहा और आज भी है। किंतु सोशल मीडिया के प्रति आरंभ से ही स्वागत भाव है। इसके प्रति समाज में अस्वीकृति नहीं दिखती क्योंकि यह कहीं न कहीं संबंधों का विस्तार कर रहा है। संवाद की गुंजाइश बना रहा है। रहिए कनेक्ट के नारे को साकार कर रहा है। इसके सही और सार्थक इस्तेमाल से छवियां गढ़ी जा रही हैं, चुनाव लड़े और जीते जा रहे हैं।
इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा किसी भी माध्यम का गलत इस्तेमाल हमें संकट में ही डालता है। यह समय इंफारमेशन वारफेयर का भी है और साइको वारफेयर का भी। इस दौर में सूचनाएं मुक्त हैं और प्रभावित कर रही हैं। यहां संपादक अनुपस्थित है और रिर्पोटर भी प्रामाणिक नहीं हैं। इसलिए सूचनाओं की वास्तविकता भी जांची जानी चाहिए। कई बार जो संकट खड़े हो रहे हैं, वह वास्तविकता से दूर होते हैं। सोशल मीडिया की पहुंच और प्रभाव को देखते हुए यहां दी जा रही सूचनाओं के सावधान इस्तेमाल की जरूरत भी महसूस की जाती है।
इसे अफवाहें, तनाव और वैमनस्य फैलाने का माध्यम बनाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। चुनावों या संवेदनशील राजनीतिक मौकों पर राजनेताओं के फर्जी भाषणों या बयानों वाले डीपफेक वीडियो का प्रसार मतदाताओं को भ्रमित कर सकता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्पक्षता और जनमत को गलत दिशा में मोड़ने का एक खतरनाक हथियार बनता जा रहा है।
वॉयस क्लोनिंग (आवाज की नकल) और वीडियो डीपफेक का उपयोग करके अब कॉरपोरेट घरानों, बैंकों और आम नागरिकों को चूना लगाने के मामले तेजी से बढ़े हैं। ठग फेक आइडेंटिटी के जरिए बड़ी आर्थिक धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे हैं। हालांकि डीपफेक और भ्रामक कृत्रिम सामग्री (SGI) पर लगाम कसने के लिए अब कानूनों को सख्त किया गया है। इसके तहत एआई-जनित फोटो, वीडियो या ऑडियो पर स्पष्ट 'डिजिटल स्टैम्प' या लेबल लगाना अनिवार्य किया गया है ताकि उपयोगकर्ता पहली नजर में पहचान सकें।
शक्ति का हो सार्थक इस्तेमाल-
सोशल मीडिया में समरस और मानवीय समाज की रचना की शक्ति छिपी है। किंतु उसकी यह संभावना उसके इस्तेमाल करने वालों में छिपी हुयी है। इसका सही इस्तेमाल ही हमें इसके वास्तविक लाभ दिला सकता है। सामाजिक सवालों पर जागरूकता और जनचेतना के जागरण में भी यह माध्यम सहायक सिद्ध हो सकता है। आम चुनावों में राजनीतिक दलों ने इस माध्यम की ताकत को इस्तेमाल किया और समझा है। आज युवा शक्ति के इस माध्यम में बड़ी उपस्थित के चलते इसे सामाजिक बदलाव और परिवर्तन का वाहक भी माना जा रहा है।
सकात्मकता से भरे-पूरे युवा और सामाजिक सोच से लैस लोग इस माध्यम से उपजी शक्ति को भारत के निर्माण में लगा सकते हैं। ऐसे समय में जब सोशल मीडिया की शक्ति का प्रगटीकरण साफ है, हमें इसके सावधान, सतर्क और समाज के लिए उपयोगी प्रयोगों की तरफ बढ़ने की जरूरत है। यदि ऐसा संभव हो सका तो सोशल मीडिया की शक्ति हमारे लोकतंत्र के लिए वरदान साबित हो सकती है।
डीपफेक का सबसे बुरा शिकार अक्सर महिलाएं और प्रसिद्ध हस्तियां हो रही हैं, जिनकी तस्वीरें या वीडियो का गलत इस्तेमाल करके उनकी मानहानि या ऑनलाइन उत्पीड़न किया जाता है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा पर सीधा हमला है।
एंगेजमेंट की भूख से बढ़ता खतरा-
सोशल मीडिया के एल्गोरिदम 'एंगेजमेंट' (व्यूज और लाइक्स) के भूखे होते हैं। झूठी और सनसनीखेज खबरें सच की तुलना में तेजी से फैलती हैं, जिससे सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का कारोबार फल-फूल रहा है। यह केवल सरकारों या टेक कंपनियों की लड़ाई नहीं है। मुख्यधारा के मीडिया और जागरूक नागरिकों को आगे आकर फेक नैरेटिव्स का खंडन करना होगा और तकनीक के सकारात्मक इस्तेमाल को बढ़ावा देते हुए एक सुरक्षित डिजिटल स्पेस का निर्माण करना होगा।
पारंपरिक कहावत "आंखों देखी पर विश्वास करो" अब डिजिटल युग में दम तोड़ रही है। जब वीडियो और तस्वीरों पर से लोगों का भरोसा उठ जाता है, तो समाज में हर प्रामाणिक और सच्ची घटना पर भी शक का माहौल पैदा होने लगता है। सोशल मीडिया ने अपनी लोकप्रियता के साथ भरोसे का संकट भी खड़ा किया है, इसमें दो राय नहीं है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
'मीडिया संवाद' कार्यक्रम में 'एआई के दौर का न्यूज़रूम: रफ्तार, भरोसा और पत्रकारिता का भविष्य' विषय पर एक महत्वपूर्ण परिचर्चा आयोजित की गई।
by
Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के 40 अंडर 40 सम्मान समारोह के तहत 28 जुलाई को आयोजित 'मीडिया संवाद' कार्यक्रम में 'एआई के दौर का न्यूज़रूम: रफ्तार, भरोसा और पत्रकारिता का भविष्य' विषय पर एक महत्वपूर्ण परिचर्चा आयोजित की गई। इस चर्चा का संचालन समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा ने किया। पैनल में जी डिजिटल (आईडीपीएल) के ग्रुप एडिटर अनुज खरे, जया कौशिक रिपोर्ट्स की संस्थापक जया कौशिक और दैनिक जागरण के दिल्ली प्रमुख स्वदेश कुमार शामिल हुए।
चर्चा की शुरुआत करते हुए पंकज शर्मा ने कहा कि आज एआई तेजी से न्यूज़रूम का हिस्सा बनता जा रहा है। स्क्रिप्ट लिखने से लेकर वीडियो एडिटिंग तक कई काम अब एआई की मदद से हो रहे हैं। लेकिन इसके साथ पत्रकारिता की विश्वसनीयता, रफ्तार और भविष्य जैसे कई बड़े सवाल भी खड़े हो रहे हैं। इसी विषय पर उन्होंने सभी वक्ताओं से उनके अनुभव और राय साझा करने को कहा।
सबसे पहले बोलते हुए अनुज खरे ने कहा कि पिछले एक साल में एआई ने न्यूज़रूम की कार्यप्रणाली पूरी तरह बदल दी है। पहले जिन कामों में घंटों लगते थे, वे अब कुछ मिनटों में पूरे हो जाते हैं। बड़ी रिपोर्टों का सार निकालना, लीगल दस्तावेज़ समझना और डेटा जुटाना बेहद आसान हो गया है। लेकिन इसके साथ सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। उन्होंने कहा कि एआई कई बार गलत जानकारी या 'हैलुसिनेशन' भी देता है और अगर पत्रकार के पास विषय की मूल समझ नहीं होगी तो वह गलत जानकारी को ही सही मानकर प्रकाशित कर सकता है। यही कारण है कि आज स्पीड बढ़ी है, लेकिन भरोसा कम हुआ है। उन्होंने कहा कि पहले खबर कई स्तरों पर जांच के बाद प्रकाशित होती थी, जबकि अब कुछ मिनटों में खबर प्रकाशित हो जाती है और बाद में उसे हटाना पड़ता है, जिससे मीडिया की साख प्रभावित होती है।
जया कौशिक ने कहा कि एआई ने टीवी न्यूज़रूम में भी गहरी पैठ बना ली है। अब कई जगह रनडाउन, स्क्रिप्ट और एंकर लिंक तक एल्गोरिद्म के आधार पर तैयार होने लगे हैं। उनके मुताबिक एआई का सबसे बड़ा नकारात्मक पक्ष यह है कि वह पत्रकार की कल्पनाशीलता और सोचने की क्षमता को धीरे-धीरे कम कर सकता है। पहले पत्रकार कई स्रोतों से जानकारी जुटाकर अपनी समझ विकसित करता था, जबकि अब लोग सीधे एआई के जवाबों पर निर्भर हो रहे हैं। हालांकि उन्होंने माना कि एआई बैकग्राउंड डेटा, रिसर्च और तकनीकी कार्यों में काफी मददगार साबित हो रहा है।
जया कौशिक ने जोर देकर कहा कि एआई कभी भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने दिल्ली बाढ़ की अपनी रिपोर्टिंग का उदाहरण देते हुए बताया कि एआई पानी का स्तर तो बता सकता है, लेकिन बाढ़ से प्रभावित लोगों का दर्द, श्मशान घाटों की स्थिति और लोगों की भावनाओं को महसूस नहीं कर सकता। उनके मुताबिक पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत उसकी संवेदनशीलता और जमीन पर जाकर सच देखने की क्षमता है।
दैनिक जागरण के दिल्ली प्रमुख स्वदेश कुमार ने कहा कि प्रिंट मीडिया में एआई फिलहाल एक सहायक की भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि डेटा जुटाने और जानकारी खोजने में जरूर समय बचता है, लेकिन खबर की प्राथमिकता तय करना, उसका नजरिया बनाना और उसे किस स्थान पर प्रकाशित करना है, यह काम आज भी इंसान ही कर सकता है। उन्होंने भरोसा जताया कि अखबार अपनी विश्वसनीयता के कारण आगे भी मजबूती से बने रहेंगे।
ब्रेकिंग न्यूज़ में एआई की भूमिका पर जया कौशिक ने कहा कि जल्दबाजी सबसे बड़ा खतरा है। उन्होंने हाल के एक एआई एडिटेड वीडियो का उदाहरण देते हुए कहा कि पत्रकार की जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ गई है। किसी भी वीडियो या दावे को प्रसारित करने से पहले मंत्रालय की वेबसाइट, आधिकारिक सोशल मीडिया और अपने विश्वसनीय स्रोतों से उसका सत्यापन करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि विश्वसनीय मीडिया संस्थान आज भी स्पीड से ज्यादा सत्यापन को प्राथमिकता देते हैं।
अनुज खरे ने कहा कि एआई हेडलाइन लिख सकता है, वीडियो बना सकता है और ट्रेंडिंग विषय बता सकता है, लेकिन वह कभी न्यूज़ जजमेंट विकसित नहीं कर सकता। कौन सी खबर सबसे महत्वपूर्ण है, किस एंगल से पेश करनी है और किसे प्रमुखता देनी है, इसका फैसला हमेशा संपादक ही करेगा। उन्होंने कहा कि एआई केवल सुझाव दे सकता है, अंतिम निर्णय इंसान का ही रहेगा क्योंकि उसके पीछे अनुभव, समझ और भावनात्मक दृष्टि होती है।
इस दौरान जया कौशिक ने यह भी चिंता जताई कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अनुभवी संपादकों की भूमिका धीरे-धीरे कम होती जा रही है। कई संस्थान युवा पत्रकारों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि वरिष्ठ संपादकों के अनुभव का पूरा लाभ नहीं उठाया जा रहा। उनके अनुसार पत्रकारिता में अनुभव और संपादकीय समझ की अहमियत हमेशा बनी रहनी चाहिए।
स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अपने अनुभव साझा करते हुए जया कौशिक ने कहा कि वह एआई का उपयोग करती हैं, लेकिन उसे केवल सहायक के रूप में रखती हैं। उनके अनुसार एआई ड्राइविंग सीट पर नहीं, बल्कि बैक सीट पर होना चाहिए। अंतिम फैसला पत्रकार का होना चाहिए, क्योंकि पत्रकार की विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है।
पत्रकार की पहचान पर स्वदेश कुमार ने कहा कि भविष्य में वही पत्रकार सफल होगा जो मौलिक और एक्सक्लूसिव रिपोर्टिंग करेगा। एआई इंटरनेट पर मौजूद सामग्री ही जुटा सकता है, लेकिन किसी घटना का वास्तविक परिप्रेक्ष्य, भीड़ का आकलन, माहौल और जमीन की सच्चाई केवल रिपोर्टर ही सामने ला सकता है।
इस बात का समर्थन करते हुए अनुज खरे ने कहा कि आज डिजिटल दुनिया में अधिकांश सामग्री एक जैसी है। ऐसे में गूगल भी अब केवल मौलिक, ग्राउंड रिपोर्टिंग और इंटरव्यू आधारित कंटेंट को प्राथमिकता दे रहा है। उन्होंने बताया कि हाल के गूगल कोर अपडेट के बाद बड़ी संख्या में वेबसाइटों की पहुंच कम हो गई क्योंकि उनके पास अलग और मौलिक सामग्री नहीं थी। आने वाले समय में वही मीडिया संस्थान टिक पाएंगे जो ओरिजिनल कंटेंट पर निवेश करेंगे।
जब पंकज शर्मा ने पूछा कि अगर न्यूज़रूम में एआई का इस्तेमाल बंद हो जाए तो सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ेगा, तो अनुज खरे ने कहा कि जिन लोगों ने पूरी तरह एआई पर निर्भरता बना ली है, उन्हें सबसे अधिक दिक्कत होगी। वहीं जया कौशिक ने कहा कि इससे कई लोगों की नौकरियां बच सकती हैं, खासकर ग्राफिक डिजाइन जैसे क्षेत्रों में। उन्होंने यह भी कहा कि स्पीड थोड़ी कम होगी, लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता बढ़ेगी और रिपोर्टर आधारित पत्रकारिता को फिर से महत्व मिलेगा।
स्वदेश कुमार ने कहा कि उनके संस्थान में एआई के उपयोग को बढ़ावा दिया गया है, लेकिन प्रिंट टीम ने उसकी कई कमियां सामने आने के कारण अभी तक उसे पूरी तरह नहीं अपनाया है। उनके अनुसार एआई हटने से केवल डेटा जुटाने में थोड़ा अधिक समय लगेगा, बाकी पत्रकारिता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।
एक अन्य सवाल के जवाब में स्वदेश कुमार ने बताया कि अब कई मीडिया संस्थान अपने-अपने एआई टूल विकसित कर रहे हैं, जिससे सभी संस्थानों का काम पूरी तरह एक जैसा नहीं होगा। वहीं अनुज खरे ने कहा कि एआई का अंधाधुंध उपयोग कई बार कंटेंट को हास्यास्पद बना देता है। इसलिए यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि कौन-सा कंटेंट एआई से तैयार किया गया है। उनके अनुसार पारदर्शिता और निष्पक्षता पत्रकारिता की बुनियादी शर्त है।
डीपफेक और फेक न्यूज़ की चुनौती पर अनुज खरे ने कहा कि आज कई तकनीकी टूल उपलब्ध हैं जो फर्जी फोटो, वीडियो और ऑडियो की पहचान कर सकते हैं। कई मीडिया संस्थान अपने फैक्ट-चेकिंग सिस्टम भी विकसित कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती जल्दबाजी है। कई बार सत्यापन पूरा होने से पहले ही कंटेंट प्रकाशित हो जाता है। उन्होंने कहा कि यदि विश्वसनीयता बचानी है तो मीडिया संस्थानों को स्पीड से ज्यादा सत्यापन को महत्व देना होगा।
युवा पत्रकारों में सबसे महत्वपूर्ण गुण पर स्वदेश कुमार ने कहा कि अब केवल अच्छा लिखना पर्याप्त नहीं है। पत्रकार को 360 डिग्री स्किल्स के साथ काम करना होगा। उसे प्रिंट, डिजिटल और वीडियो- तीनों माध्यमों में दक्ष होना चाहिए। उन्होंने बताया कि हाल ही में एक इंटर्न ने जंतर-मंतर से इतनी प्रभावी रिपोर्टिंग की कि वह अनुभवी पत्रकारों से भी बेहतर लगी।
चर्चा के अंत में जया कौशिक ने कहा कि आने वाले 10 वर्षों में एआई चाहे जितना विकसित हो जाए, लेकिन पत्रकार की संवेदनशीलता और उसकी विश्वसनीयता को मशीन कभी नहीं बदल सकती। समापन करते हुए पंकज शर्मा ने कहा कि आज लगभग हर न्यूज़रूम एआई का इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन कुछ ऐसे क्षेत्र हमेशा रहेंगे जहां इंसानी दखल अनिवार्य रहेगा। उन्होंने सभी वक्ताओं का कार्यक्रम में शामिल होकर अपने विचार साझा करने के लिए आभार व्यक्त किया।